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क्यों उल्टी दिशा में बहती है शिव के पसीने से जन्मी नर्मदा? बेहद रहस्यमयी है शिवपुत्री की कहानी

क्यों उल्टी दिशा में बहती है शिव के पसीने से जन्मी नर्मदा? बेहद रहस्यमयी है शिवपुत्री की कहानी

धर्म डेस्क। धर्म डेस्क। भारत की अधिकांश प्रमुख नदियां जैसे गंगा, यमुना और गोदावरी पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। लेकिन सनातन संस्कृति में अत्यंत पवित्र मानी जाने वाली नर्मदा और ताप्ती नदियों का रास्ता देश की बाकी नदियों से सबसे अलग है।

ये दोनों नदियां इस प्राकृतिक नियम के विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं और अरब सागर (खंभात की खाड़ी) में जाकर समाहित होती हैं। इस अनोखे और विपरीत प्रवाह के पीछे जहाँ भगवान शिव और एक अधूरी प्रेम कहानी से जुड़ी पौराणिक कथाएं हैं, वहीं एक बड़ा भौगोलिक कारण भी मौजूद है।

इसलिए कहलाती हैं ‘शिव पुत्री’ या ‘शंकरी’

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, नर्मदा नदी साक्षात भगवान शिव के शरीर से उत्पन्न हुई मानी जाती हैं, इसी वजह से इन्हें ‘शिव पुत्री’ या ‘शंकरी’ भी कहा जाता है। कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव मैकल पर्वत पर घोर तपस्या में लीन थे। तपस्या के तेज और श्रम के कारण उनके शरीर से पसीने की कुछ बूंदें धरती पर गिरीं, जिससे वहां एक दिव्य सरोवर का निर्माण हुआ।

इसी सरोवर से एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक कन्या प्रकट हुई। महादेव की तपस्या से जन्मी इस कन्या का नाम देवताओं ने ‘नर्मदा’ (नर्म यानी आनंद देने वाली) रखा। तभी से इस पावन धारा को नर्मदा कहा जाने लगा, जो अपने भक्तों के कष्टों को दूर कर उन्हें आनंद प्रदान करती हैं।

एक अधूरी प्रेम कहानी और आजीवन कुंवारी रहने का प्रण

स्कंद पुराण में वर्णित एक अन्य कथा के अनुसार, नर्मदा नदी के विपरीत दिशा में बहने के पीछे एक अधूरी प्रेम कहानी भी छिपी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नर्मदा राजा मैखल की पुत्री थीं और उनका विवाह राजकुमार सोनभद्र के साथ तय हुआ था। नर्मदा सोनभद्र से अगाध प्रेम करती थीं। विवाह से ठीक पहले नर्मदा ने अपनी दासी जोहिला के हाथों सोनभद्र के लिए एक प्रेम संदेश भेजा।

कहा जाता है कि राजकुमार सोनभद्र दासी जोहिला के रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गए। जब इस बात का पता राजकुमारी नर्मदा को चला, तो वे गहरे दुख और क्रोध में डूब गईं। उन्होंने उसी क्षण अपना रास्ता बदल लिया और आजीवन कुंवारी रहने का अटूट संकल्प लिया।

माना जाता है कि इसी शोक और क्रोध के कारण नर्मदा ने सोनभद्र से विपरीत दिशा में बहना शुरू कर दिया। आज भी अमरकंटक में नर्मदा और सोनभद्र की धाराएं अलग-अलग दिशाओं में बहती दिखाई देती हैं।

‘रिफ्ट वैली’ की खास बनावट

पौराणिक कथाओं से अलग भू-वैज्ञानिकों के पास इस उल्टे प्रवाह का एक बेहद ठोस वैज्ञानिक तर्क है। हालांकि, भारतीय प्रायद्वीप का सामान्य ढलान पूर्व की ओर है, लेकिन नर्मदा और ताप्ती नदियां विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित एक धंसी हुई घाटी से होकर बहती हैं, जिसे ‘रिफ्ट वैली’ (Rift Valley) यानी भ्रंश घाटी कहा जाता है।

इन दो विशाल पर्वतों के बीच की जमीन की बनावट और पथरीली संरचना ऐसी है कि यहां जमीन का ढलान पूर्व के बजाय पश्चिम की तरफ हो गया है। यही भौगोलिक कारण नर्मदा और ताप्ती जैसी नदियों को बाकी नदियों के विपरीत दिशा में बहने पर मजबूर करता है।

दर्शन मात्र से मिलता है गंगा स्नान जैसा पुण्य

नर्मदा नदी को ‘रेवा’ के नाम से भी जाना जाता है और सनातन धर्म में इसका विशेष स्थान है। स्कंद पुराण के अनुसार, जहां अन्य नदियों में स्नान से पुण्य मिलता है, वहीं शिवपुत्री नर्मदा के केवल दर्शन मात्र से ही भक्तों को उतने पुण्य फल की प्राप्ति हो जाती है, जितने गंगा नदी में स्नान करने से मिलते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नर्मदा का यह विपरीत प्रवाह भक्तों के लिए दृढ़ संकल्प, अटूट निष्ठा और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी राह खुद चुनने का एक महान प्रतीक माना जाता है।

अस्वीकरण – इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य ज्योतिषीय मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। नईदुनिया इन दावों की पुष्टि नहीं करता और न ही अंधविश्वास का समर्थन करता है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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