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भोपाल जेल में बंद पूर्व जज गिरिबाला सिंह पढ़ रही हैं ‘द प्रेग्नेंट किंग’, जानिए क्यों खास है यह किताब

भोपाल जेल में बंद पूर्व जज गिरिबाला सिंह पढ़ रही हैं ‘द प्रेग्नेंट किंग’, जानिए क्यों खास है यह किताब

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के चर्चित त्विषा शर्मा डेथ केस में सलाखों के पीछे पहुंचीं पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह इन दिनों केंद्रीय जेल भोपाल में अपना समय किताबें पढ़कर बिता रही हैं। जेल सूत्रों के अनुसार, वे प्रसिद्ध उपन्यास ‘द प्रेग्नेंट किंग’ (The Pregnant King) को बेहद दिलचस्पी के साथ पढ़ रही हैं।

कानून की गहरी समझ रखने वाली एक पूर्व जज का जेल की कोठरी में इस खास किताब को चुनना चर्चा का विषय बना हुआ है।

ऐसे में हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर ‘द प्रेग्नेंट किंग’ की कहानी क्या है और इसमें ऐसा क्या है जो एक पूर्व न्यायधीश को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

क्या है ‘द प्रेग्नेंट किंग’ की कहानी?

वर्ष 2008 में पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित यह किताब महाभारत और पुराणों में वर्णित राजा युवनाश्व की एक बेहद कम चर्चित और असाधारण लोककथा पर आधारित है। कहानी के केंद्र में राजा युवनाश्व हैं, जो अपनी तीन रानियों के साथ सालों तक संतान प्राप्ति के लिए पूजा-पाठ करते हैं। लेकिन एक दैवीय चमत्कार और भूल के कारण, राजा खुद एक बच्चे को अपने गर्भ में धारण कर लेते हैं और अपने वारिस ‘मान्धाता’ को जन्म देते हैं।

इस तरह राजा युवनाश्व एक ही समय में बच्चे के पिता और माता दोनों बन जाते हैं। जैविक रूप से असंभव लगने वाली यह कहानी समाज, जेंडर (लिंग) और पहचान के कई गहरे दार्शनिक सवाल खड़े करती है।

पहचान, अधिकार और धर्म का अंतर्द्वंद्व

पेशे से डॉक्टर और मशहूर मिथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक ने इस पौराणिक कथा के जरिए मनुष्य के भीतर चलने वाले कई अंतर्द्वंद्वों को उजागर किया है…

  • पहचान का संकट: किताब का मुख्य पात्र राजा युवनाश्व खुद से यह दर्दनाक सवाल पूछता है – मैंने पुरुषों की तरह अपने बाहर भी जीवन को जन्म दिया है और महिलाओं की तरह अपने भीतर भी। आखिर यह बात मुझे क्या बनाती है? यह सवाल इंसान की अपनी पहचान की तलाश को दिखाता है।
  • इच्छा बनाम सामाजिक कर्तव्य (धर्म): यह उपन्यास दिखाता है कि कैसे एक व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छाएं और समाज द्वारा तय किए गए नियम या ‘धर्म’ आपस में टकराते हैं। राजा को न केवल समाज और शासन चलाना है, बल्कि अपने इस अनूठे रूप के साथ भी जीना है।
  • पात्रों की अनूठी कशमकश: किताब में शिलवती नाम की एक महिला पात्र है जिसके पास राजा जैसा दिमाग है, लेकिन वह अपने जेंडर के कारण बंधनों में है। वहीं अर्जुन के एक साल के अज्ञातवास (नपुंसक डांसर के रूप में) और शिखंडी जैसी कथाओं के जरिए लेखक ने यह बताने की कोशिश की है कि समाज में सही और गलत की परिभाषाएं कितनी पेचीदा हो सकती हैं।
  • वर्तमान संदर्भों में क्यों प्रासंगिक है यह किताब?

    लेखक देवदत्त पटनायक के अनुसार, पौराणिक कथाएं या मिथक केवल काल्पनिक कहानियां नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की सामूहिक मानसिकता और गहरे सच को समझने का जरिया होती हैं। इस किताब में लेखक ने इतिहास और भूगोल को थोड़ा बदला है ताकि यह आज के दौर के पाठकों को भी प्रासंगिक लगे। उन्होंने युवनाश्व को पांडवों के समकालीन के रूप में दिखाया है, जो अर्जुन से संवाद करते हैं।

    यह भी पढ़ें- Twisha Sharma Case: पौराणिक कथाओं के पन्नों में खोईं जेल में बंद पूर्व जज, महिला आयोग को नहीं मिले वीआईपी ट्रीटमेंट के संकेत

    जेल की तन्हाई में बंद पूर्व जज गिरिबाला सिंह के इस किताब को पढ़ने के कई मायने निकाले जा रहे हैं। यह किताब पाठक को यह सिखाती है कि जीवन में “कोई भी उत्तर पूरी तरह सही या गलत नहीं होता, बल्कि सब कुछ समय, परिस्थिति और व्यक्ति के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।” धर्म, कानून, सामाजिक मर्यादा और मानवीय इच्छाओं के इसी कशमकश को समझने के लिए शायद पूर्व जज इस उपन्यास के पन्नों को खंगाल रही हैं।

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