मनीष करे, नईदुनिया, खंडवा। अवधूत संत खंडवा के धूनीवाले दादाजी महाराज को गेहूं के आटे से बना टिक्कड़ पसंद था। इसीलिए केशवानंद जी महाराज (बड़े दादाजी) और हरिहर भोले सरकार (छोटे दादाजी) महाराज की समाधि पर प्रतिदिन टिक्कड़ की महाप्रसादी का भोग लगता है।
दादाजीधाम दर्शनों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसादी के रूप में टिक्कड़ ही दिया जाता है। इसे पाकर श्रद्धालु स्वयं को धन्य समझता है। श्री धूनीवाले दादाजी ट्रस्ट और पटेल सेवा समिति के आश्रम में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में आटे की टिक्कड़ प्रसादी तैयार होती है। गुरुपूर्णिमा के दौरान मात्रा दस गुना तक बढ़ जाती है, लेकिन गुरुपूर्णिमा पर दादाजी को टिक्कड़ का भोग नहीं लगता है।
भक्त हाथ पसार कर करते हैं प्रसाद ग्रहण
खंडवा के दादाजीधाम की महाप्रसादी टिक्कड़ देश ही नहीं विदेशों में रहने वाले भक्तों के लिए छप्पन भोग से भी बढ़कर माना जाता है। इसे पाने के लिए यहां आने वाला भक्त हाथ पसार कर अगाध श्रद्धा से इसे ग्रहण करता है। टिक्कड़ को आज भी चूल्हे पर लकड़ी जलाकर सेवादारों द्वारा तैयार किया जाता है। रोटी के आकार के टिक्कड़ की मोटाई अधिक होने से इसकी सिकाई विशेष रूप से होती है। इसे लकड़ी की आंच पर दोनों तरफ से फूलने पर ही पका हुआ माना जाता है।

भक्तों के लिए प्रतिदिन होता है भंडारा
बताया जाता है कि बड़े दादाजी की मंडली में शामिल चेले-चपाटी और भक्तों के लिए प्रतिदिन भंडारा होता है। इसमें विभिन्न व्यंजनों के अलावा टिक्कड़ भी बनता है। पटेल सेवा समिति के मदन भाऊ ठाकरे का कहना है कि जो खाए टिक्कड़ व रहे फक्कड़, दादाजी महाराज को टिक्कड़ अति प्रिय थे। उनका मानना था कि यह प्रसादी गरीब भी आसानी से तैयार कर नैवेद्य लगा सकता है, क्योंकि गेहूं का आटा, नमक और चूल्हा गरीब से गरीब व्यक्ति के घर में रहता है। वहीं इससे छोटे-बड़े का भेद मिटने के साथ समानता का भाव रहेगा।
गुरुपूर्णिमा पर उमड़ रहा गुरु भक्तों का सैलाब
श्री धूनीवाले आश्रम में स्थित बड़े और छोटे दादाजी महाराज की समाधि के दर्शनों के लिए देशभर से लोग आते हैं। दादाजी दरबार में 96 सालों से धूनी अनवरत प्रज्वलित है। इस धूनी की वजह से ही दादाजी को धूनी वाले दादाजी के नाम से जाना जाता है। गुरुपूर्णिमा पर यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है। दो दिनों में करीब पांच लाख श्रद्धालु गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन करने आते हैं।
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इनकी सेवा-सत्कार में शहर कोई कमी नहीं रखता है। चाय, नाश्ता, खाना और ठहरने से लेकर लोकल परिवहन तक निःशुल्क दादाजी भक्त मुहैया करवाते हैं। दादाजी दरबार क्षेत्र से लेकर शहर ही नहीं आसपास के अंचलों में भी लोग भंडारों का आयोजन पैदल निशान लेकर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शुरू हो गए हैं। यहां 29 जुलाई को मनाने वाले गुरुपूर्णिमा उत्सव को लेकर भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है। वहीं शहर इनकी मेजबानी के लिए तैयारी में जुट गया है।

मां नर्मदा के अनन्य भक्त थे बड़े दादाजी
केशवानंद जी महाराज बड़े दादाजी का प्रमाणिक जीवन वृत्तांत मौजूद नहीं है। वे मां नर्मदा के भक्त थे। उनके गुरु गौरीशंकर महाराज थे। नर्मदा परिक्रमा करते हुए दादाजी खंडवा आए और यहीं के होकर रह गए। एक डंडा, चिमटा और कंबल हमेशा साथ रहता था। पवित्र अग्नि प्रज्वलित कर वे साधना व ध्यान करते थे। सन 1930 में वे समाधिलीन हो गए थे। उनकी समाधि दादाजीधाम में ही स्थित है। इसके दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।
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छोटे दादाजी को मिला हरिहर भोले का नाम
बड़े दादाजी केशवानंदजी के दर्शनों के लिए राजस्थान के डीडवाना से आए भंवरलाल इतने प्रभावित हुए कि स्वयं को दादाजी के चरणों में समर्पित कर दिया। दादाजी उन्हें हरिहर तथा सेवाभावी शिष्य उन्हें हरिहरानंद महाराज के नाम से पुकारते थे। बड़े दादाजी के उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने दादाजी आश्रम की बागडोर संभाली और आश्रम संचालन के नियम तय किए। इसके अनुसार ही आज भी सेवा और पूजन होता है। सन 1942 में छोटे दादाजी ने दुनिया को त्याग दिया। उनकी समाधि भी गुरु बड़े दादाजी के समीप ही बनाई गई है।
श्री धूनीवाले आश्रम के ट्रस्टी सुभाष नागोरी ने बताया कि दादाजी महाराज की महाप्रसादी के रूप में टिक्कड़ का भोग प्रतिदिन लगता है। बड़े और छोटे दादाजी को प्रतिदिन छह बार भोग लगता है। इसमें टिक्कड़ के अलावा अन्य व्यंजन भी रहते हैं।







