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फुलेरा दूज 2026: ब्रज की होली का आगाज और श्रीकृष्ण-राधा के अटूट प्रेम का प्रतीक

फुलेरा दूज 2026: ब्रज की होली का आगाज और श्रीकृष्ण-राधा के अटूट प्रेम का प्रतीक

ब्रज की होली पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी असली शुरुआत कब और कैसे होती है? दरअसल, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया ति …और पढ़ें

Publish Date: Wed, 18 Feb 2026 07:21:32 PM (IST)Updated Date: Wed, 18 Feb 2026 07:21:32 PM (IST)

ब्रज की होली का आगाज और श्रीकृष्ण-राधा के अटूट प्रेम का प्रतीक

HighLights

  1. फुलेरा दूज से शुरू होता है ब्रज का भव्य उत्सव
  2. विरह के अंत और फूलों की होली की पावन कथा
  3. शादी और शुभ कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ और दोषमुक्त दिन

धर्म डेस्क। ब्रज की होली पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी असली शुरुआत कब और कैसे होती है? दरअसल, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ‘फुलेरा दूज’ (Phulera Dooj 2026) मनाई जाती है। इसी दिन से ब्रज में होली का विधिवत शंखनाद हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के अटूट प्रेम और प्रकृति के पुनर्जीवित होने का प्रतीक है।

विरह की उदासी और कृष्ण का आगमन

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब भगवान श्रीकृष्ण अपने काम में इतने व्यस्त हो गए कि वे लंबे समय तक राधारानी से मिलने नहीं जा सके। कान्हा के विरह में राधारानी अत्यंत दुखी रहने लगीं। उनकी यह उदासी देख गोपियां भी उदास हो गईं और इसका सीधा असर प्रकृति पर पड़ा। जब प्रकृति मुरझाने लगी और पुष्प सूखने लगे, तब अपनी प्रियतमा के कष्ट को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने राधारानी से मिलने का निर्णय लिया। जब कान्हा बरसाना पहुंचे, तो वहां की मुरझाई हुई हरियाली उनके आने मात्र से खिल उठी।

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फूलों की होली की शुरुआत: राधारानी का वो चंचल मजाक

राधारानी प्रसन्न हो गईं और उन्होंने पास ही खिला हुआ एक फूल तोड़कर मजाक में कृष्ण पर फेंक दिया। जवाब में कृष्ण ने भी फूल तोड़कर उन पर वर्षा की। यह नजारा देख वहां उपस्थित गोपियों और ग्वालों ने भी एक-दूसरे पर फूलों की बौछार शुरू कर दी। इसी घटना को ‘फूलों की होली’ कहा जाने लगा। मान्यता है कि तभी से हर साल फुलेरा दूज के दिन ब्रज के मंदिरों में विशेष उत्सव मनाया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक, इस दिन भगवान कृष्ण को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है और उनके कमर पर फेंटा (एक प्रकार का पटका) बांधा जाता है। यह संकेत है कि अब ठाकुर जी भी होली खेलने के लिए तैयार हैं।

अबूझ मुहूर्त का महत्व: बिना पंचांग देखे होंगे शुभ कार्य

फुलेरा दूज को साल का सबसे ‘अबूझ मुहूर्त’ (सबसे शुभ दिन) माना जाता है। इस दिन की विशेषता यह है कि किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य को शुरू करने के लिए पंडित से विशेष मुहूर्त निकलवाने की जरूरत नहीं पड़ती। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह दिन दोषमुक्त होता है, इसलिए विवाह, सगाई और गृह प्रवेश जैसे बड़े कार्यों के लिए इसे सर्वोत्तम माना गया है।

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