धर्म डेस्क। कश्मीर की खूबसूरत वादियों के बीच एक ऐसा दैवीय स्थान है, जिसके रहस्य आज के आधुनिक विज्ञान के लिए भी एक बड़ी पहेली हैं। हम बात कर रहे हैं गांदरबल जिले के तुलमुला गांव में स्थित ‘माता रागन्या देवी मंदिर’ की, जिसे देश-दुनिया में ‘खीर भवानी’ के नाम से जाना जाता है।
हर साल ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी के मौके पर यहां वार्षिक ‘खीर भवानी मेले’ का आयोजन होता है, जिसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु विशेषकर कश्मीरी पंडित घाटी पहुंचते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां स्थित एक पवित्र जल कुंड है, जिसे लेकर मान्यता है कि यह आने वाली प्राकृतिक या सामाजिक आपदाओं का संकेत पहले ही दे देता है।
कुंड के रंग बदलने का अनोखा रहस्य
इस मंदिर के परिसर में मौजूद पवित्र प्राकृतिक कुंड का पानी समय-समय पर अपना रंग बदलता रहता है। स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस कुंड के पानी का गहरा या काला होना किसी बड़े संकट का सूचक माना जाता है।
इतिहास के झरोखों को देखें तो ब्रिटिश काल के अधिकारी वाल्टर लॉरेंस ने साल 1886 में इस कुंड के पानी का रंग बैंगनी दर्ज किया था। वहीं, साल 1990 में जब कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, तब इस कुंड का पानी पूरी तरह काला पड़ गया था। इसके बाद साल 2014 में कश्मीर में आई भीषण और विनाशकारी बाढ़ से ठीक पहले भी इस पवित्र कुंड के जल का रंग अचानक बदल गया था। वैज्ञानिक आज तक इसके पानी के अचानक रंग बदलने के सही कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं।
क्यों पड़ा ‘खीर भवानी’ नाम?
इस मंदिर में सदियों से एक अनोखी परंपरा चली आ रही है। यहाँ आने वाले भक्त माता रागन्या देवी को प्रसन्न करने के लिए पवित्र कुंड में दूध और चावल से बनी खीर अर्पित करते हैं। इसी विशेष प्रसाद और परंपरा के कारण माता का नाम ‘खीर भवानी’ प्रचलित हो गया। इन्हें महाराज्ञा देवी और राज्ञी भगवती के नाम से भी श्रद्धापूर्वक पुकारा जाता है।

ग्रंथों में दर्ज है इतिहास
इस स्थान का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व बेहद प्राचीन है। कल्हण की प्रसिद्ध कृति ‘राजतरंगिणी’ में इस कुंड का जिक्र ‘माता रागिनी कुंड’ के रूप में मिलता है, जहाँ सदियों से लोग दर्शन के लिए आते रहे हैं। इसके अतिरिक्त, मुगल काल के ग्रंथ ‘आईन-ए-अकबरी’ में अबुल फजल ने भी इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का वर्णन किया है। आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद और स्वामी राम तीर्थ जैसे महान संतों ने भी इस स्थान की यात्रा कर यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा को महसूस किया था।
स्वप्न के जरिए मिला खोया हुआ तीर्थ
एक पौराणिक कथा के अनुसार, हजारों साल पहले आए एक भयंकर सैलाब में यह पवित्र स्थान पानी में डूबकर लुप्त हो गया था। इसके बाद संवत 4041 में योगी कृष्ण पंडित को माता ने स्वप्न में दर्शन दिए और एक नाग के रूप में जल पर तैरते हुए इस सही स्थान की पहचान कराई।
समय के साथ श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दूध और सामग्री से कुंड के नीचे एक मोटी परत जम गई थी। जब इसकी सफाई कराई गई, तो वहाँ से प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष और मूर्तियां बरामद हुईं। इसके बाद संवत 1969 में तत्कालीन महाराजा प्रताप सिंह ने इस कुंड के ठीक बीचों-बीच संगमरमर के एक बेहद खूबसूरत मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज भी चिनार के घने पेड़ों के बीच आकर्षण का केंद्र है।

लंकापति रावण से जुड़ा है पौराणिक संबंध
इस मंदिर की उत्पत्ति को लेकर एक बेहद रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है। इसके अनुसार, माता रागन्या देवी लंका के राजा रावण की कुलदेवी थीं। रावण की भक्ति से खुश होकर माता ने उसे असीम सुख-समृद्धि दी थी। लेकिन जब रावण अधर्म के रास्ते पर चल पड़ा और उसने माता सीता का हरण किया, तो देवी उससे रुष्ट हो गईं।
माता ने अपनी प्रिय लंका को छोड़ दिया और पवनपुत्र हनुमान जी को आदेश दिया कि वे उन्हें कश्मीर के सतीसर क्षेत्र में स्थापित करें। तब से माता यहीं वास कर रही हैं। कहा जाता है कि रावण ने ही सबसे पहले देवी की पूजा कर उन्हें खीर का भोग लगाया था।

‘तुलमुल’ नाम के पीछे की वजह
जिस गांव में यह मंदिर स्थित है, उसके नाम ‘तुलमुल’ को लेकर दो तरह के विचार हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यहां पहले शहतूत का एक विशाल पेड़ था, जिसे कश्मीरी भाषा में ‘तुल मुल’ कहा जाता है। वहीं, कुछ विद्वान इसे संस्कृत के शब्द ‘अतुल्य मूल्य’ का अपभ्रंश मानते हैं, जिसका अर्थ है- अत्यंत कीमती या जिसका कोई मोल न हो।







