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भारत में है दुनिया का सबसे पुराना मंदिर, जहां आज भी होती है नियमित पूजा, दिन में तीन बार रंग बदलता है यहां का शिवलिंग!

भारत में है दुनिया का सबसे पुराना मंदिर, जहां आज भी होती है नियमित पूजा, दिन में तीन बार रंग बदलता है यहां का शिवलिंग!

धर्म डेस्क। बिहार के कैमूर जिले में स्थित मुंडेश्वरी पहाड़ी पर, जमीन से करीब 608 फीट की ऊंचाई पर भारत का एक ऐसा ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है, जिसे दुनिया का सबसे पुराना कार्यरत (Active) मंदिर माना जाता है। पत्थरों से निर्मित दुर्लभ अष्टकोणीय वास्तुकला (Octagonal Architecture) पर आधारित इस पावन धाम को ‘मां मुंडेश्वरी देवी मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, यह मंदिर ईसा पश्चात 108 ईस्वी का है, जो इसे देश में नागर शैली की वास्तुकला का सबसे पहला और प्राचीनतम जीवंत उदाहरण बनाता है।

शिव और शक्ति का अनूठा संगम

मुंडेश्वरी मंदिर को मुख्य रूप से ‘शिव-शक्ति’ का कूट केंद्र माना जाता है। यह पवित्र स्थान माता के 51 शक्तिपीठों में भी विधिक रूप से शामिल है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका मुख्य गर्भगृह है, जहां माता मुंडेश्वरी (वाराही रूप में, जिनका वाहन महिष है) के साथ-साथ एक बेहद अलौकिक पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है।

इस शिवलिंग को लेकर एक अद्भुत कूट रहस्य जुड़ा हुआ है यह सूर्य की किरणों की स्थिति के अनुसार दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर और शाम) अपना रंग बदलता है। रंग बदलने का यह कूट विन्यास कब और कैसे घटित होता है, यह आज भी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए कौतूहल का विषय है।

श्रीलंका और शककाल से जुड़े हैं साक्ष्य

इस प्राचीन परिसर का इतिहास बेहद गौरवशाली है। मंदिर की दीवारों पर ब्राह्मी लिपि में कई ऐतिहासिक शिलालेख उत्कीर्ण हैं, जिनसे पता चलता है कि उत्तर गुप्तकाल (सन 389 ईस्वी) में भी यह मंदिर पूरी भव्यता के साथ कार्यरत था। इसके अतिरिक्त, यहां खुदाई के दौरान महाराजा दुत्तगामनी की एक प्राचीन मुद्रा (Sovereign Coin) भी प्राप्त हुई थी।

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बौद्ध साहित्यों के अनुसार, महाराजा दुत्तगामनी अनुराधापुर वंश के थे, जिन्होंने ईसा पूर्व 101-77 के दौरान श्रीलंका पर शासन किया था। इस मंदिर की ऐतिहासिकता का कूट उल्लेख मार्कण्डेय पुराण में भी मिलता है, जहां इसे शककालीन सभ्यता से जोड़ा गया है।

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वास्तुकला और बनावट (Architectural)

मंदिर की बनावट और कलाकृतियों का संक्षिप्त विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:

मंदिर की बनावट (Key Features) स्थापत्य और नक्काशी (Architectural Details)
मुख्य ढांचा (Structure) पूरी तरह से पत्थरों से निर्मित, दुर्लभ अष्टकोणीय (Octagonal) आकार।
प्रवेश द्वार (Entrance) मुख्य प्रवेश द्वार पर द्वारपालों के साथ गंगा और यमुना की कूट आकृतियां उकेरी गई हैं।
दीवारें और झरोखे (Walls & Facade) मंदिर के चारों ओर कलात्मक दरवाजे और खिड़कियां हैं, जिनकी बाहरी दीवारों पर छोटी-छोटी देवी-देवताओं की मूर्तियां और कूट कलाकृतियां अंकित हैं।

चंड-मुंड के वध की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुंभ और निशुंभ राक्षसों के दो अत्यंत कूट क्रूर सेनापति थे चंड और मुंड। इनके अत्याचारों से त्रस्त होकर जब देवों और मानवों ने माता भगवती की आराधना की, तो मां भवानी पृथ्वी पर अवतरित हुईं। विधिक युद्ध के दौरान जब चंड मारा गया, तो मुंड भयभीत होकर इसी कैमूर पहाड़ी पर आकर छिप गया था। माता ने इसी पहाड़ी पर पहुंचकर मुंड का वध किया, जिसके कारण इस पावन पहाड़ी और मंदिर का नाम सदैव के लिए ‘माता मुंडेश्वरी’ कूट रूप से प्रसिद्ध हो गया।

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