By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Sat, 18 Jul 2026 01:39:48 PM (IST)Updated Date: Sat, 18 Jul 2026 01:39:48 PM (IST)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान मनाया जाने वाला हेरा पंचमी का त्योहार आद मनाया जाएगा। का पर्व इस साल 18 जुलाई 2026 को मनाया जाएगा। यह पर्व रथ यात्रा शुरू होने के पांचवें दिन आता है और इसका विशेष संबंध माता महालक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ से जुड़ी एक पौराणिक कथा से है।
‘हेरा’ का अर्थ है देखना या निहारना, जबकि ‘पंचमी’ का मतलब है पांचवां दिन। इसी वजह से रथ यात्रा के पांचवें दिन माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ की खोज में श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए निकलती हैं।
क्या है हेरा पंचमी का महत्व?
हेरा पंचमी, पुरी रथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं। जब कई दिन बीत जाने के बाद भी वे वापस नहीं लौटते, तब माता लक्ष्मी उन्हें खोजने के लिए गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं।
यह आयोजन भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के प्रेम, मान-मनुहार और पारिवारिक भावनाओं का प्रतीक माना जाता है।
कैसे मनाया जाता है हेरा पंचमी का पर्व?
हेरा पंचमी के दिन मंदिर में सबसे पहले विधि-विधान से माता महालक्ष्मी का श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद उनकी प्रतिमा को मंदिर परिसर में गर्भगृह के दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित बरगद के पेड़ के नीचे रखी पालकी में विराजमान किया जाता है।
इसके बाद सेवक पालकी को अपने कंधों पर उठाकर गुंडिचा मंदिर की ओर लेकर चलते हैं। पूरे मार्ग में शंख, घंटियां, ढोल-नगाड़ों और भजन-कीर्तन के बीच हजारों श्रद्धालु माता लक्ष्मी के जयकारे लगाते हैं। पालकी के पीछे चलने वाली महिलाएं पारंपरिक हेरा पंचमी गीत गाती हैं, जिनमें माता लक्ष्मी की नाराजगी और भगवान जगन्नाथ के प्रति उनका उलाहना व्यक्त किया जाता है।
गुंडिचा मंदिर पहुंचने पर क्या होता है?
गुंडिचा मंदिर पहुंचने पर माता लक्ष्मी की पालकी भगवान जगन्नाथ के रथ के पास रोकी जाती है। इसके बाद मंदिर के पुजारी भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा से एक पुष्पमाला लेकर माता लक्ष्मी को पहनाते हैं। मुख्य पुजारी देवी लक्ष्मी की आरती करते हैं। संध्या आरती के बाद माता की प्रतिमा को मंदिर के अंदर ले जाया जाता है, जहां दही का भोग अर्पित कर पूजा की जाती है। इसके बाद माता लक्ष्मी की प्रतिमा को भगवान जगन्नाथ के सामने लाकर उनकी आरती उतारी जाती है।
क्यों नाराज हुई थीं माता लक्ष्मी?
पौराणिक कथा के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। कहा जाता है कि प्रस्थान से पहले भगवान जगन्नाथ ने माता लक्ष्मी से वादा किया था कि वे अगले ही दिन लौट आएंगे। लेकिन चार दिन बीत जाने के बाद भी जब वे वापस नहीं आते, तो माता लक्ष्मी चिंतित और नाराज हो जाती हैं। पांचवें दिन वे पालकी में बैठकर गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं और भगवान जगन्नाथ के रथ के पास जाती हैं। वहां वे भगवान से श्रीमंदिर लौटने का आग्रह करती हैं।
रथ तोड़ने की परंपरा क्यों निभाई जाती है?
मान्यता है कि जब माता लक्ष्मी वापस लौटने लगती हैं और भगवान जगन्नाथ उनके साथ नहीं आते, तो वे क्रोधित हो जाती हैं। इसी नाराजगी में वे अपने एक सेवक को भगवान जगन्नाथ के रथ का एक छोटा हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त करने का आदेश देती हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी स्वयं एक पेड़ के पीछे खड़ी होकर यह दृश्य देखती हैं और फिर श्रीमंदिर लौट जाती हैं। यह परंपरा आज भी हेरा पंचमी उत्सव के दौरान प्रतीकात्मक रूप से निभाई जाती है।
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