राजस्थान आज देश की ऊर्जा राजनीति के सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर राज्य को “भारत का ग्रीन एनर्जी हब” बनाने के दावे किए जा रहे हैं, दूसरी ओर उन्हीं दावों के बीच यह चिंता भी तेज होती जा रही है कि कहीं राजस्थान केवल बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन का माध्यम बनकर न रह जाए, जबकि उसकी आर्थिक कीमत यहां का उपभोक्ता, किसान और मध्यमवर्ग चुकाए?
करीब 8 हजार करोड़ रुपये की लागत से 5,760 मेगावाट सौर ऊर्जा के लिए प्रस्तावित नया ट्रांसमिशन कॉरिडोर इसी बहस के केंद्र में आ गया है। बीकानेर से अलवर तक विकसित होने वाला यह नेटवर्क तकनीकी दृष्टि से निस्संदेह महत्वाकांक्षी परियोजना है, लेकिन इसके आर्थिक, सामाजिक और संघीय प्रभावों को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।
विवाद तब और गहरा गया जब ऊर्जा विभाग से जुड़े रहे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अजीताभ शर्मा की सोशल मीडिया पोस्ट सार्वजनिक हुई जिसमें उन्होंने इस प्रोजेक्ट का जिक्र किए बिना उन्होंने सीधा सवाल उठाया कि यदि यह ट्रांसमिशन नेटवर्क मुख्य रूप से दूसरे राज्यों को बिजली आपूर्ति के लिए तैयार किया जा रहा है, तो उसकी लागत उपभोक्ताओं पर क्यों डाली जाए? यह प्रश्न केवल प्रशासनिक असहमति नहीं है। यह सीधे-सीधे आर्थिक न्याय, संघीय संतुलन और सार्वजनिक नीति की पारदर्शिता से जुड़ा हुआ विषय है।
दरअसल राजस्थान आज देश में रिन्यूएबल एनर्जी का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। विशाल भूभाग, अत्यधिक सौर विकिरण और अपेक्षाकृत कम भूमि लागत ने इसे सौर ऊर्जा निवेश का प्रमुख गढ़ बना दिया है। बीकानेर, जैसलमेर, फलोदी, बाड़मेर और जोधपुर जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं विकसित हो रही हैं। केंद्र सरकार भी “ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर” की रणनीति के तहत राजस्थान को राष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण आधार मान रही है। लेकिन सवाल विकास का नहीं, विकास के मॉडल का है। सवाल यह नहीं कि ट्रांसमिशन नेटवर्क क्यों बन रहा है; सवाल यह है कि उसका आर्थिक बोझ कौन उठाएगा और लाभ किसे मिलेगा।
यह परियोजना टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग (TBCB) मॉडल पर विकसित की जानी है। इसके अंतर्गत पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) इसकी मॉनिटरिंग करेगा, जबकि निजी कंपनियां इसे लगभग 35 वर्षों तक संचालित करेंगी। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि परियोजना की लागत की वसूली बिजली टैरिफ के माध्यम से क्या उपभोक्ताओं से की जाएगी? यहीं से असली विवाद शुरू होता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब बिजली का प्रवाह अंतर्राज्यीय (Inter-State) स्वरूप का हो, तब उसके ट्रांसमिशन शुल्क का निर्धारण और वितरण “पॉइंट ऑफ कनेक्शन” (PoC) तंत्र के माध्यम से साझा होना चाहिए। यदि राजस्थान केवल एक “ट्रांजिट स्टेट” की भूमिका निभा रहा है और यहां उत्पादित बिजली का बड़ा हिस्सा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली या अन्य राज्यों को जा रहा है, तो उस नेटवर्क का पूरा कैपिटल एक्सपेंडिचर (CAPEX) राजस्थान के उपभोक्ताओं के बिजली बिल में जोड़ना तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता। यही वह आर्थिक विसंगति है जिसने इस परियोजना को तकनीकी विषय से निकालकर जनसरोकार का मुद्दा बना दिया है।
राजस्थान का उपभोक्ता पहले से ही महंगी बिजली दरों, फ्यूल सरचार्ज, फिक्स्ड चार्ज और वितरण कंपनियों की वित्तीय अक्षमताओं का बोझ उठा रहा है। किसानों को अनिश्चित सब्सिडी और ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर आपूर्ति का सामना करना पड़ता है। मध्यमवर्गीय परिवार लगातार बढ़ते बिजली बिलों से परेशान हैं और छोटे उद्योग बिजली लागत के कारण प्रतिस्पर्धा खोते जा रहे हैं। ऐसे समय में यदि 8 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना की लागत भी धीरे-धीरे टैरिफ में जोड़ दी जाती है, तो इसका सीधा प्रभाव आम नागरिक की जेब पर पड़ेगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या यह न्यायसंगत होगा कि बिजली उत्तर प्रदेश या हरियाणा के उद्योगों तक पहुंचे, लेकिन उसका स्थायी वित्तीय बोझ राजस्थान का किसान, व्यापारी और मध्यमवर्गीय परिवार उठाए? यह केवल आर्थिक प्रश्न नहीं, बल्कि संघीय न्याय का प्रश्न भी है। भारत का संघीय ढांचा इस सिद्धांत पर आधारित है कि राष्ट्रीय परियोजनाओं का लाभ और बोझ दोनों समान रूप से साझा किए जाएं। यदि राजस्थान देश की ऊर्जा महत्वाकांक्षा का केंद्रीय आधार बन रहा है, तो केंद्र सरकार और लाभान्वित राज्यों की वित्तीय भागीदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। केवल भूमि, पर्यावरणीय दबाव और उपभोक्ता लागत राजस्थान पर छोड़ देना संतुलित नीति नहीं कही जा सकती।
विडंबना यह है कि जिस राजस्थान को “ऊर्जा राजधानी” कहा जा रहा है, उसी राज्य के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी वोल्टेज समस्या, ट्रिपिंग और अनियमित आपूर्ति जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। गर्मियों में बिजली कटौती आम शिकायत बन जाती है। ऐसे में जनता स्वाभाविक रूप से पूछेगी कि पहले राज्य की अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी या राष्ट्रीय ऊर्जा निर्यात मॉडल?
सरकार और ऊर्जा कंपनियों के तर्कों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। यह सही है कि यदि राजस्थान को वैश्विक स्तर का रिन्यूएबल एनर्जी हब बनाना है, तो बड़े ट्रांसमिशन नेटवर्क आवश्यक होंगे। केवल बिजली उत्पादन पर्याप्त नहीं होता; उसे राष्ट्रीय ग्रिड तक सुरक्षित और स्थिर तरीके से पहुंचाने के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा, तो हजारों मेगावाट सौर ऊर्जा “कर्टेलमेंट” की स्थिति में पहुंच सकती है और निवेश प्रभावित होगा।
इसके अतिरिक्त मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क उद्योगों को भी आकर्षित करते हैं। जहां बिजली आपूर्ति स्थिर होती है, वहां डेटा सेंटर, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और नई औद्योगिक परियोजनाएं तेजी से आती हैं। इसलिए सरकार इसे केवल बिजली परियोजना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास के रूप में देख रही है।
लेकिन विकास का अर्थ केवल इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण नहीं होता। विकास का अर्थ यह भी होता है कि उसका लाभ और बोझ न्यायपूर्ण तरीके से वितरित हो।
यहीं सरकार की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है—पारदर्शिता की कमी। आज तक जनता के सामने स्पष्ट रूप से यह नहीं रखा गया कि—परियोजना की वास्तविक वित्तीय संरचना क्या होगी? राज्य उपभोक्ताओं पर अनुमानित टैरिफ प्रभाव कितना पड़ेगा? केंद्र सरकार इसकी लागत में कितना योगदान देगी? क्या राजस्थान को सस्ती बिजली या विशेष आर्थिक लाभ मिलेगा? निजी कंपनियों के 35 वर्षीय संचालन मॉडल में उपभोक्ता सुरक्षा के क्या प्रावधान होंगे? इन सवालों के बिना किसी भी परियोजना को केवल “विकास” कह देना पर्याप्त नहीं है। दरअसल यह पूरा मामला भारत के ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) की बड़ी तस्वीर को भी सामने लाता है। देश तेजी से हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यदि इस परिवर्तन की लागत सामाजिक रूप से असमान तरीके से बांटी जाएगी, तो भविष्य में इसका विरोध भी उतना ही तेज होगा। ग्रीन एनर्जी का अर्थ केवल सोलर पार्क और हाई-वोल्टेज लाइनें नहीं हैं; इसका अर्थ “ऊर्जा न्याय” भी होना चाहिए।
राजस्थान को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह केवल ऊर्जा उत्पादक राज्य बनकर न रह जाए, बल्कि ऊर्जा समृद्ध राज्य भी बने। यदि राज्य अपनी भूमि, प्राकृतिक संसाधन और ट्रांसमिशन क्षमता देश को दे रहा है, तो बदले में उसे भी विशेष आर्थिक संरक्षण, सस्ती बिजली, औद्योगिक निवेश और स्थानीय रोजगार मिलना चाहिए।
अन्यथा यह मॉडल धीरे-धीरे “ऊर्जा उपनिवेशवाद” जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, जहां संसाधन एक राज्य के हों और लाभ किसी अन्य क्षेत्र को अधिक मिले। समाधान की दिशा: केवल सवाल नहीं, स्पष्ट नीति भी चाहिए।
राजस्थान की ऊर्जा क्षमता निस्संदेह देश के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है, लेकिन यह अवसर तभी सार्थक और न्यायसंगत माना जाएगा जब विकास की इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता, संघीय संतुलन और उपभोक्ता हित सर्वोच्च प्राथमिकता बनें। इसके लिए अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि एक स्पष्ट “पांच-सूत्रीय ऊर्जा न्याय कार्यक्रम” की आवश्यकता है।
1. यदि यह ट्रांसमिशन कॉरिडोर मुख्यतः अंतर्राज्यीय बिजली आपूर्ति के लिए बनाया जा रहा है, तो इसकी लागत पूरी तरह राजस्थान के उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जानी चाहिए। केंद्र सरकार, लाभान्वित राज्य और निजी निवेशकों के बीच स्पष्ट cost-sharing mechanism तैयार किया जाना चाहिए। PoC तंत्र को पारदर्शी तरीके से लागू कर यह सुनिश्चित किया जाए कि राजस्थान केवल भुगतानकर्ता बनकर न रह जाए।
2.राज्य सरकार और विद्युत नियामक आयोग को परियोजना के संभावित tariff impact पर एक विस्तृत श्वेतपत्र जारी करना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि अगले 10 से 20 वर्षों में उनके बिजली बिल पर इसका कितना असर पड़ेगा।
3. राजस्थान के लिए “ग्रीन डिविडेंड” की अवधारणा लागू की जानी चाहिए। यदि राज्य राष्ट्रीय ऊर्जा संक्रमण का नेतृत्व कर रहा है, तो उसके नागरिकों को भी उसका प्रत्यक्ष लाभ मिलना चाहिए। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए रियायती बिजली, किसानों के लिए स्थिर आपूर्ति, प्रभावित जिलों के लिए विशेष विकास पैकेज और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार प्राथमिकता जैसे प्रावधान अनिवार्य किए जाने चाहिए।
4.TBCB मॉडल के अंतर्गत निजी कंपनियों को 35 वर्षों के लिए संचालन सौंपना दक्षता तो ला सकता है, लेकिन इससे जवाबदेही कमजोर नहीं होनी चाहिए। PFC और राजस्थान विद्युत विनियामक आयोग (RERC) को नियमित ऑडिट, प्रदर्शन समीक्षा और उपभोक्ता शिकायत निवारण की मजबूत व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।
5. राज्य की अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि राजस्थान बिजली पैदा करे, बाहर भेजे और उसके अपने उपभोक्ता अनियमित आपूर्ति झेलते रहें। ग्रामीण क्षेत्रों, कृषि और छोटे उद्योगों के लिए विश्वसनीय बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।
अंत में, इतनी बड़ी परियोजनाओं को केवल प्रशासनिक मंजूरी तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इस पर विधानसभा में विस्तृत चर्चा, विशेषज्ञ समीक्षा और सार्वजनिक विमर्श आवश्यक होना चाहिए। ऊर्जा नीति जितनी तकनीकी है, उतनी ही लोकतांत्रिक भी। इस पूरे विवाद का सबसे सकारात्मक पक्ष यही है कि सिस्टम के भीतर से सवाल उठे हैं। लोकतंत्र में बड़े सार्वजनिक निवेशों पर प्रश्न उठाना विकास विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन की पहचान है।
राजस्थान सरकार को इस अवसर को टकराव की तरह नहीं, बल्कि विश्वास निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। यदि परियोजना वास्तव में राज्य और देश दोनों के हित में है, तो उसकी आर्थिक और नीतिगत पारदर्शिता जनता के सामने रखनी चाहिए। क्योंकि अंततः ऊर्जा केवल तकनीकी विषय नहीं होती; वह राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय का भी विषय होती है।
राजस्थान के सामने आज ऐतिहासिक अवसर है। उसकी धूप देश को रोशन कर सकती है, उसकी भूमि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का आधार बन सकती है। लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब राजस्थान का नागरिक स्वयं आर्थिक बोझ तले दबा हुआ महसूस न करे।
-इंजी. गोपेश शर्मा (तकनीकी विश्लेषक)







