धर्म डेस्क। रामायण में कई ऐसे पात्र हैं, जिनकी कहानियां आज भी लोगों को चौंकाती हैं। इन्हीं में से एक है लंकापति रावण और उसकी भतीजी त्रिजटा का रहस्यमयी रिश्ता। अपार शक्ति और ज्ञान का स्वामी रावण, जिस से देवता तक कांपते थे, वही रावण अपनी ही भतीजी त्रिजटा के सामने असहज और भयभीत रहता था। इसके पीछे एक गहरी पौराणिक कथा छिपी है। आइए जानते हैं, आखिर ऐसा क्यों था।
कौन थी त्रिजटा?
त्रिजटा, रावण के छोटे भाई विभीषण की पुत्री थी। जैसे विभीषण धर्म, सत्य और विवेक के मार्ग पर चलते थे, वैसी ही उनकी बेटी त्रिजटा भी दिव्य ज्ञान से संपन्न थी। उसे भविष्य की घटनाओं का पूर्वाभास होता था और उसके देखे गए सपने कभी असत्य नहीं होते थे।
राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद त्रिजटा सदैव सत्य और धर्म के पक्ष में खड़ी रही। वह यह भली-भांति जानती थी कि रावण अधर्म के मार्ग पर चल पड़ा है और उसका विनाश निश्चित है।
त्रिजटा का भयावह सपना
जब माता सीता अशोक वाटिका में बंदी थीं, तब उन्हें डराने और प्रताड़ित करने के लिए रावण कई राक्षसियों को भेजता था। इन्हीं राक्षसियों में त्रिजटा भी शामिल थी।
एक रात त्रिजटा ने एक ऐसा भयानक सपना देखा, जिसने सब कुछ बदल दिया। सपने में उसने देखा कि पूरी लंका नगरी जलकर राख हो चुकी है। रावण का अंत हो चुका है और विभीषण, भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता के साथ पुष्पक विमान में विराजमान होकर लंका के ऊपर से जा रहे हैं।
रावण क्यों डर गया?
त्रिजटा ने अपना सपना अन्य राक्षसियों को सुनाया और कहा कि यह भविष्यवाणी जल्द ही सच होने वाली है। यह सुनते ही सभी राक्षसियां भयभीत हो गईं और माता सीता को सताना बंद कर दिया।
जब यह बात रावण तक पहुंची, तो वह भी विचलित हो उठा। रावण जानता था कि त्रिजटा के सपने कभी झूठे नहीं होते। यही कारण था कि वह त्रिजटा के सामने स्वयं को असहाय महसूस करता था और उसके शब्दों से भयभीत रहता था।
अधर्म के अंत का संकेत
त्रिजटा का सपना दरअसल अधर्म पर धर्म की विजय का संकेत था। यही वजह है कि रावण, जिसने कभी किसी से भय नहीं खाया, वह भी त्रिजटा की भविष्यवाणियों से डरता था।







