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महाभारत के 9वें दिन क्यों भगवान कृष्ण ने तोड़ दिए युद्ध के नियम? वजह जान चौंक जाएंगे आप

महाभारत के 9वें दिन क्यों भगवान कृष्ण ने तोड़ दिए युद्ध के नियम? वजह जान चौंक जाएंगे आप

महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह मर्यादाओं, सिद्धांतों और प्रतिज्ञाओं की भी परीक्षा थी। भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के …और पढ़ें

Publish Date: Wed, 21 Jan 2026 03:56:00 PM (IST)Updated Date: Wed, 21 Jan 2026 03:56:00 PM (IST)

महाभारत के 9वें दिन क्यों भगवान कृष्ण ने तोड़ दिए युद्ध के नियम? AI Generated

HighLights

  1. भीष्म ने ली प्रतिज्ञा- या तो अर्जुन मरेगा या कृष्ण उठाएंगे शस्त्र
  2. 9वें दिन भीष्म के बाणों से घायल हुए अर्जुन, हार की कगार पर थे पांडव
  3. भक्त के लिए कृष्ण ने तोड़ा अपना वचन, शस्त्र की तरह उठाया पहिया

धर्म डेस्क। महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह मर्यादाओं, सिद्धांतों और प्रतिज्ञाओं की भी परीक्षा थी। भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के प्रारंभ में प्रतिज्ञा ली थी- ‘मैं इस युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊंगा, केवल अर्जुन का सारथी बनूंगा।’ लेकिन युद्ध के 9वें दिन एक ऐसा क्षण आया जब ‘अच्युत’ को अपने भक्त के लिए अपना ही संकल्प भंग करना पड़ा।

भीष्म पितामह की भीषण चुनौती

इस घटना की पृष्ठभूमि युद्ध के 8वें दिन की रात को तैयार हुई। कौरव पक्ष की निरंतर क्षति से क्षुब्ध होकर दुर्योधन ने भीष्म पितामह पर पांडवों के प्रति ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ रखने का आरोप लगाया। आत्मसम्मान पर चोट लगते ही गंगापुत्र ने हुंकार भरी और प्रतिज्ञा ली- ‘कल या तो अर्जुन का अंत होगा, या मैं श्री कृष्ण को शस्त्र उठाने पर विवश कर दूंगा।’ यह केवल एक योद्धा की शपथ नहीं, बल्कि भगवान को दी गई एक भक्त की चुनौती थी।

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9वें दिन का रण: जब संकट में आए अर्जुन

9वें दिन के युद्ध में भीष्म पितामह का ‘काल’ रूप प्रकट हुआ। उनके बाणों की मार से पांडव सेना में हाहाकार मच गया। अर्जुन, जो अपने पितामह के प्रति मोह और संकोच से भरे थे, उनके वेग को रोक पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे थे। पितामह के तीक्ष्ण बाणों ने अर्जुन को लहूलुहान कर दिया और स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि अर्जुन का वध निश्चित लगने लगा।

भक्त के प्रेम में टूटी ‘जगदीश्वर’ की प्रतिज्ञा

जब श्री कृष्ण ने देखा कि अर्जुन निढाल हो चुके हैं और भीष्म के प्रहार रुक नहीं रहे हैं, तो उनका हृदय द्रवित हो उठा। अपने भक्त की रक्षा के लिए उन्होंने तत्काल रथ से छलांग लगा दी। क्रोध और आवेश में उन्होंने जमीन पर पड़े एक टूटे हुए रथ का पहिया उठा लिया और उसे ‘सुदर्शन चक्र’ की तरह घुमाते हुए भीष्म की ओर बढ़ चले।

भक्ति की विजय और समर्पण

भगवान को अपनी ओर शस्त्र (पहिया) लेकर आता देख भीष्म पितामह ने धनुष त्याग कर हाथ जोड़ लिए। पौराणिक व्याख्याओं के अनुसार, भीष्म यही चाहते थे- वे जगत को दिखाना चाहते थे कि भगवान के लिए अपनी प्रतिज्ञा से बढ़कर अपने भक्त का प्रेम है। यद्यपि अर्जुन ने कृष्ण के चरणों को पकड़कर उन्हें शांत किया और उनकी प्रतिज्ञा की याद दिलाई, किंतु उस दिन यह सिद्ध हो गया कि “भक्त की लाज रखने के लिए भगवान स्वयं का नियम तोड़ने में भी संकोच नहीं करते।”

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