धर्म डेस्क। श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान उस समय प्रकट हुआ, जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्ध में मोह और संशय में डूब गए थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्म, धर्म और जीवन का गूढ़ संदेश दिया। गीता के चौथे अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक “यदा यदा हि धर्मस्य…” इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ
हे अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेकर संसार में प्रकट होता हूं।
इस श्लोक का अर्थ केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। यहां ‘धर्म’ का मतलब सत्य, न्याय, कर्तव्य और मानवता के मूल सिद्धांतों से है। जब समाज में अन्याय, अत्याचार और असंतुलन बढ़ जाता है, तब उसे संतुलित करने के लिए ईश्वरीय शक्ति किसी न किसी रूप में सामने आती है।
छिपे हैं गहरे रहस्य
भगवान श्रीकृष्ण का संदेश यह भी स्पष्ट करता है कि उनका उद्देश्य सिर्फ बुराई का अंत करना नहीं, बल्कि अच्छे लोगों की रक्षा और धर्म की पुनः स्थापना करना है। “तदात्मानं सृजाम्यहम्” का अर्थ है कि वे समय-समय पर अलग-अलग रूपों में प्रकट होकर संतुलन बहाल करते हैं।
यह श्लोक आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है। यह हमें सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अंततः जीत सत्य और न्याय की ही होती है। जब जीवन में अन्याय महसूस हो, तब यह विश्वास बनाए रखना जरूरी है कि हर अंधकार के बाद उजाला जरूर आता है।







