देशभर में होली की तैयारियां शुरू हो गई हैं। होली से आठ दिन पहले होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है। होलाष्टक का ज्योतिषीय महत्व भी है। ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा ने बताया कि होलाष्टक में मांगलिक कार्य जैसे शादी-विवाह, मुंडन, नामकरण, गृह प्रवेश आदि कार्य करना वर्जित हैं।
By Arvind Dubey
Publish Date: Sat, 22 Feb 2025 11:58:48 AM (IST)
Updated Date: Sat, 22 Feb 2025 11:58:48 AM (IST)
HighLights
- होली का डंडा भक्त प्रह्लाद और होलिका का प्रतीक
- डांडा के आसपास लकड़ी और कंडे लगाए जाते हैं
- होलिका दहन वाले दिन इन्हें ही अग्नि दी जाती है
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। होली का पर्व 40 दिन पूर्व वसंत पंचमी से शुरू हो जाता है। ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) कमर में पीतांबरी बांधकर रंगों से होली खेलने के लिए तैयार हो जाते हैं।
होली का हुड़दंग होलाष्टक लगने यानी डांडा गढ़ने के साथ शुरू हो जाता है। इस वर्ष होलिकाष्टक (होलाष्टक) 7 मार्च से शुरू होंगे और इसी दिन शुभ कार्यों पर प्रतिबंध लग जाएगा।

होलाष्टक में नहीं किए जाते शुभ कार्य
- ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा ने बताया कि होलाष्टक से सभी ग्रह उग्र हो जाते हैं और अनुकूल फल प्रदान नहीं करते हैं। होलाष्टक में कोई भी मांगलिक कार्य जैसे शादी-विवाह, मुंडन, नामकरण, गृह प्रवेश आदि कार्य करना वर्जित हैं।
- होलाष्टक में सभी ग्रह उग्र अवस्था में आ जाते हैं और नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। इसलिए इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। होलाष्टक के समय दान और व्रत का भी महत्व है।
- इस दौरान वस्त्र, अन्न, धन, आदि का दान करना शुभ माना जाता है। यह कष्टों से मुक्ति और अनुकूल फल देता है।

होली का डांडा भक्त प्रह्लाद और उनकी बुआ का प्रतीक
कई स्थानों पर होलाष्टक के दिन ही होली का डांडा गाढ़ा जाता है। होली का डंडा भक्त प्रह्लाद और उनकी बुआ होलिका की स्मृति का प्रतीक है। डांडा के आसपास लकड़ी और कंडे लगाए जाते हैं और फिर होलिका दहन के दिन इसे अग्नि दी जाती है।
हर शहर के प्रमुख चौराहों व गली, मोहल्लों में डांडा गाढ़ा जाता है। उसी दिन से होली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।








