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आंखों में पट्टी बांधकर होती है भगवान जगन्नाथ की स्थापना, मूर्ति के लिए लकड़ी चुनने के नियम भी खास, जानें क्यों है यह मंदिर पूरी दुनिया में अनोखा

आंखों में पट्टी बांधकर होती है भगवान जगन्नाथ की स्थापना, मूर्ति के लिए लकड़ी चुनने के नियम भी खास, जानें क्यों है यह मंदिर पूरी दुनिया में अनोखा

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर भारत के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक है। हर साल निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। वर्ष 2026 में रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी। भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथ यात्रा को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।

जगन्नाथ मंदिर सिर्फ अपनी आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है। हालांकि, इनमें से कई बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिनकी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है।

मूर्ति के भीतर ‘ब्रह्म पदार्थ’ की मान्यता

जगन्नाथ मंदिर में जब नवकलेवर (मूर्तियों का परिवर्तन) होता है, तब पुरानी मूर्तियों से एक अत्यंत गोपनीय ‘ब्रह्म पदार्थ’ नई मूर्तियों में स्थापित किया जाता है।

मंदिर की परंपरा के अनुसार, यही भगवान का दिव्य तत्व माना जाता है। कई श्रद्धालु इसे भगवान श्रीकृष्ण के हृदय से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, मंदिर प्रशासन और सेवायत इसकी वास्तविक प्रकृति सार्वजनिक नहीं करते।

आंखों पर पट्टी बांधकर होती है ब्रह्म पदार्थ की स्थापना

धार्मिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्म पदार्थ को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय होती है। कहा जाता है कि इस दौरान पुजारियों की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है और वे दस्ताने पहनकर यह प्रक्रिया पूरी करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

अधूरी क्यों हैं भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां?

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों से अलग दिखाई देती हैं। इनमें पूर्ण हाथ-पैर नहीं बने हैं। लोक कथाओं के अनुसार, देव शिल्पी विश्वकर्मा बंद कमरे में मूर्तियां बना रहे थे। लेकिन तय समय से पहले दरवाजा खोल दिए जाने पर उन्होंने मूर्तियां अधूरी छोड़ दीं। इसके बाद इन्हीं मूर्तियों की पूजा शुरू हो गई।

विशेष नीम के पेड़ से बनती हैं मूर्तियां

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की नई मूर्तियां सामान्य लकड़ी से नहीं, बल्कि विशेष नीम के पेड़ों (दारु) से बनाई जाती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इन पेड़ों को चुनने के लिए कई विशेष नियम निर्धारित हैं।

दारु (नीम के पेड़) चुनने के नियम

मूर्तियों के लिए चुने जाने वाले पेड़ में कई विशेषताएं होना जरूरी माना जाता है। मान्यता के अनुसार-

  • पेड़ में चार मुख्य शाखाएं हों।
  • पास में श्मशान हो।
  • चींटियों की बांबी मौजूद हो।
  • आसपास जलाशय या तालाब हो।
  • जड़ के पास सांप का बिल हो।
  • आसपास बेल, वरुण और सहादा के पेड़ हों।

इन सभी मानदंडों पर खरा उतरने वाले पेड़ को ही मूर्ति निर्माण के लिए चुना जाता है।

हर साल नहीं बदलती हैं मूर्तियां

जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियां हर वर्ष नहीं बदली जातीं। इनका परिवर्तन केवल नवकलेवर के दौरान होता है, जब हिंदू पंचांग में आषाढ़ मास के साथ अधिकमास (मलमास) पड़ता है। यह संयोग लगभग 8 से 19 वर्षों के अंतराल पर आता है।

नमी के बावजूद वर्षों तक सुरक्षित रहती हैं मूर्तियां

पुरी समुद्र तट के पास स्थित है, जहां वातावरण में नमी अधिक रहती है। इसके बावजूद मंदिर की लकड़ी की मूर्तियां वर्षों तक सुरक्षित रहती हैं। श्रद्धालु इसे भगवान की कृपा मानते हैं, जबकि विशेषज्ञ इसे विशेष नीम की लकड़ी और पारंपरिक संरक्षण विधियों से जोड़कर देखते हैं।

रथ यात्रा के तीन भव्य रथ

रथ यात्रा में तीनों देवताओं के लिए हर वर्ष नए रथ तैयार किए जाते हैं।

नंदीघोष – भगवान जगन्नाथ का रथ

  • रंग: पीला और लाल
  • ऊंचाई: लगभग 45.6 फीट
  • पहिए: 16

तालध्वज – भगवान बलभद्र का रथ

  • रंग: हरा और लाल
  • ऊंचाई: लगभग 45 फीट
  • पहिए: 14

दर्पदलन (पद्म रथ) – देवी सुभद्रा का रथ

  • रंग: काला और लाल
  • ऊंचाई: लगभग 44.6 फीट
  • पहिए: 12

छेरा पहरा की अनोखी परंपरा

रथ यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक छेरा पहरा है। इस परंपरा के तहत पुरी के गजपति महाराज स्वयं सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं और उन पर सुगंधित जल व चंदन का छिड़काव करते हैं।

यह परंपरा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि भगवान जगन्नाथ के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं तथा हर कोई स्वयं को भगवान का सेवक मानता है।

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