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आखिर क्यों भगवान श्रीराम ने प्राण से प्यारे लक्ष्मण को दिया था मृत्युदंड?

आखिर क्यों भगवान श्रीराम ने प्राण से प्यारे लक्ष्मण को दिया था मृत्युदंड?

रामायण के उत्तरकांड का एक अनसुना प्रसंग बताता है कि कैसे भगवान श्रीराम को अपने प्रिय भाई लक्ष्मण को मृत्युदंड के समान दंड देना पड़ा। यमराज ने श्रीराम …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 14 Apr 2026 02:24:14 PM (IST)Updated Date: Tue, 14 Apr 2026 02:24:14 PM (IST)

श्रीराम ने लक्ष्मण को क्यों दिया था मृत्युदंड। (एआई से जेनरेट किया गया इमेज)

HighLights

  1. श्रीराम ने लक्ष्मण को क्यों दिया था मृत्युदंड।
  2. ऋषि दुर्वासा का क्रोध और लक्ष्मण की मजबूरी।
  3. लक्ष्मण ने जल समाधि लेकर प्राणों का बलिदान दिया।

धर्म डेस्क। धर्म डेस्क। रामायण, महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित एक प्राचीन भारतीय महाकाव्य है, जिसमें हैरान कर देने वाले कई प्रसंग मिलते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही प्रसंग के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में कम ही लोग जानते होंगे।

यमराज ने रखी थी यह कठिन शर्त

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रामायण के उत्तरकांड में जिक्र मिलता है कि प्रभु श्रीराम को अपने भाई लक्ष्मण को एक भयानक दंड देना पड़ा था। कथा के अनुसार, रावण वध और वनवास से वापस लौटने के बाद राम जी अयोध्या के राजा बन गए और शासन करने लगे।

एक दिन मृत्यु के देवता यमराज एक ऋषि का रूप धारण कर श्रीराम जी से मिलने के लिए अयोध्या पहुंचे। वह राम जी से एकांत में बात करना चाहते थे। उन्होंने एक शर्त भी रखी कि हमारी बातचीत के बीच अगर कोई भी आता है, तो उसे मृत्युदंड दिया जाए। तब भगवान राम ने लक्ष्मण को यमराज की शर्त बताते हुए द्वार पर पहरा देने के लिए कहा।

ऋषि दुर्वासा का क्रोध और लक्ष्मण की मजबूरी

लक्ष्मण ने मजबूरी में यह कदम उठाया। इसी बीच ऋषि दुर्वासा वहां आ पहुंचे, जो अत्यधिक क्रोध और श्राप देने के लिए जाने जाते थे। वह राम जी से शीघ्र ही मिलना चाहते थे। लक्ष्मण ने उन्हें रोकने और समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं माने।

लक्ष्मण के रोकने पर ऋषि दुर्वासा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कहा कि अगर तुमने मुझे श्रीराम से नहीं मिलने दिया, तो मैं पूरी अयोध्या नगरी को अपने श्राप से जलाकर राख कर दूंगा। ऋषि दुर्वासा की बात सुनने के बाद लक्ष्मण जी के पास कोई विकल्प नहीं बचा और वह यमराज और श्रीराम की गुप्त बातचीत के दौरान कक्ष में प्रवेश कर गए।

ऋषि वशिष्ठ की सलाह और लक्ष्मण का त्याग

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लक्ष्मण के कक्ष में प्रवेश करते ही यमराज, जो अपने असली रूप में थे, अंतर्धान हो गए। अपने वचन के अनुसार, राम जी को लक्ष्मण को मृत्युदंड देना था, तब उन्होंने ऋषि वशिष्ठ से सहायता मांगी। ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें सलाह दी कि वह लक्ष्मण का त्याग कर उन्हें राज्य से बाहर भेज दें, जो उनके लिए मृत्युदंड के समान ही है।

गुरु वशिष्ठ की सलाह पर श्रीराम ने लक्ष्मण का ‘परित्याग’ कर दिया। तब लक्ष्मण जी ने इस बात को स्वीकार करते हुए सरयू नदी में जल समाधि ले ली। यह घटना प्रभु श्रीराम के ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ होने को भी सिद्ध करती है, क्योंकि भगवान श्रीराम ने अपने वचन और मर्यादा की रक्षा के लिए अपने भाई लक्ष्मण को मृत्युदंड के समान ही दंड दिया था।

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