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आस्था और इतिहास का संगम: मुरैना के ऐंती पर्वत पर हनुमान जी ने स्थापित किए थे शनिदेव, जानें पौराणिक रहस्य

आस्था और इतिहास का संगम: मुरैना के ऐंती पर्वत पर हनुमान जी ने स्थापित किए थे शनिदेव, जानें पौराणिक रहस्य

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वाालियर। भगवान शनिदेव का प्राकट्योत्सव शनिचरी अमावस्या 16 मई शनिवार को मनाया जाएगा। त्रेता युगकालीन ऐंती के शनिदेव मंदिर और गोला का मंदिर पर उनके पिता सूर्यनारायण का मंदिर होने के कारण अंचल पर सूर्य और शनि की युक्ति की प्रति छाया होने के कारण भगवान शनिदेव का विशेष महत्व है। भगवान शनिदेव के प्रतिकूल प्रभाव से बचने के लिए जौरासी में माता श्री अष्ट महालक्ष्मी की प्राण-प्रतिष्ठा की गई है।

मुरैना जिले के ऐंती पहाड़ी पर विराजित भगवान शनिदेव की ऐसी मान्यता है कि लंका दहन के समय श्रीराम भक्त हनुमान भगवान शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त कराकर सुरक्षित स्थान पर ऐंती पहाड़ी पर ही विराजित किया था। इसी वर्ष डबरा में भव्य नवग्रह पीठ की प्राण-प्रतिष्ठा की हैं। यहां भी शनिदेव सपत्नीक विराजित हैं। नवग्रह पीठ का पहला भगवान शनिदेव का प्राकट्योत्सव है। मुरैना जिले के ऐंती गांव में एक प्रसिद्ध शनि मंदिर है, जो त्रेताकालीन है और पृथ्वी पर शनि देव का पहला मंदिर माना जाता है।

ऐंती में शनिदेव ध्यान मुद्रा में विराजित हैं

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां विराजित शनिदेव की अद्भुत प्रतिमा है। सामान्यतः शनिदेव की दृष्टि को कठोर माना जाता है, इसलिए लोग उनकी दृष्टि से बचते हैं। लेकिन ऐंती में स्थापित शनिदेव ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं, जो भक्तों को विशेष आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने पर शनि की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

ऐतिहासिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के साथ यह मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने यहां शनिदेव की प्रतिमा की स्थापना करवाई थी। बाद में संवत 1806 में दौलतराव सिंधिया द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। इसी कारण यह स्थल आस्था के साथ-साथ इतिहास का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है।

तपस्या कर पुनः शक्ति प्राप्त की। इसी वजह से इस स्थान को ‘शनि पर्वत’ कहा जाता है, जो दुनिया में अपनी तरह का अनोखा स्थल माना जाता है।

यह भी किवदंती: मंदिर में स्थापित शनिदेव की प्रतिमा को लेकर भी कई रोचक मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मूर्ति उल्कापिंड यानी आकाश से गिरे पत्थर से बनी है। इसका रंग गहरा काला है और इसमें चुंबकीय गुण पाए जाते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि प्रतिमा के समीप पहुंचने पर विशेष ऊर्जा का अनुभव होता है। यही कारण है कि यह स्थान तंत्र साधना के लिए भी प्रसिद्ध माना जाता है।

शनि लोक प्रस्तावित

अब इस धार्मिक स्थल को पर्यटन के मानचित्र पर और अधिक विकसित करने की तैयारी की जा रही है। पर्यटन विभाग ने इसे प्रसाद योजना में शामिल करने के लिए 120 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा है। प्रस्तावित योजना के तहत यहां ‘शनि लोक’, परिक्रमा मार्ग और सप्त ऋषियों की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी, जिससे यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकेगा।

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डबरा में नवग्रह पीठ बना श्रद्धा और आध्यात्म का नया केंद्र

डबरा में नव निर्मित नवग्रह पीठ श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण और आस्था का नया केंद्र बनकर उभर रहा है। वैदिक परंपरा और ज्योतिषीय मान्यताओं के आधार पर तैयार इस भव्य नवग्रह पीठ में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु देव की विधिवत स्थापना की गई है।

ज्योतिष विद्वानों के मत है कि यहां सभी ग्रह सपत्नीक विराजित होने के कारण उनकी आध्यात्मिक शक्ति कई गुना फलदायी मानी जा रही है। नवग्रह पीठ का निर्माण धार्मिक वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा को ध्यान में रखकर किया गया है। परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विशेष पूजा-अर्चना और हवन का आयोजन भी नियमित रूप से किया जा रहा है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां दर्शन और पूजा करने से ग्रह दोषों में शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। प्रतिदिन काफी संख्या में श्रद्धालु नवग्रह पीठ के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं।

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