ऑफिस के बीच पितृ पक्ष में नौकरीपेशा लोगों के मन में यह सवाल अक्सर रहता है कि क्या वे सुबह ही तर्पण करके काम पर निकल सकते हैं या दोपहर तक रुकना जरूरी ह…और पढ़ें
Publish Date: Wed, 30 Sep 2026 11:38:36 AM (IST)Updated Date: Wed, 30 Sep 2026 11:38:36 AM (IST)
धर्म डेस्क। भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ हो चुके पितृ पक्ष (महालय श्राद्ध) के दौरान अपने पूर्वजों को तर्पण, पिंडदान और अर्घ्य देना सनातन धर्म का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। हालांकि, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नौकरीपेशा और कामकाजी लोगों के सामने यह सवाल बार-बार आता है कि क्या सुबह-सुबह जल्दी तर्पण करके ऑफिस निकला जा सकता है, या फिर दोपहर (अपराह्न काल) तक घर पर रुकना जरूरी है?
आइए धर्मशास्त्रों, पंचांगीय नियमों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जानते हैं कि इस स्थिति में नौकरीपेशा लोगों को क्या करना चाहिए-
श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर का समय ही क्यों महत्वपूर्ण है?
शास्त्रों और पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष में किया जाने वाला पार्वण श्राद्ध और मुख्य पिंडदान अपराह्न काल (दोपहर का समय) में ही शास्त्रीय रूप से फलदायी माना जाता है। दिन का आठवां मुहूर्त ‘कुतुप काल’ (लगभग सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक) है। इसके बाद रौहिण और अपराह्न काल को पितरों के आगमन और तृप्ति का समय माना गया है।
यदि आप अपने पूर्वज की निश्चित तिथि का मुख्य पार्वण श्राद्ध (ब्राह्मण भोजन, पिंडदान आदि) कर रहे हैं, तो केवल सुबह-सुबह 5 मिनट में जल देकर चले जाना शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता। मुख्य श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर के निर्धारित समय का पालन करना जरूरी है।
नौकरीपेशा लोग क्या करें?
यदि ऑफिस के समय के कारण दोपहर में घर पर उपस्थित रहना संभव न हो, तो धर्मशास्त्रों में इसके लिए कुछ विकल्प और समाधान बताए गए हैं-
- हाफ-डे या लीव (छुट्टी) का प्रबंध: यदि आप स्वयं अपने परिवार के मुख्य श्राद्धकर्ता (ज्येष्ठ पुत्र या एकमात्र कर्ता) हैं और आपके घर में तिथि का मुख्य श्राद्ध है, तो उस विशेष दिन ऑफिस से आधे दिन (Half-Day) या पूरे दिन की छुट्टी लेना सबसे उत्तम और धर्मसम्मत मार्ग है।
सुबह के समय क्या कर सकते हैं?
- प्रातःकालीन तर्पण और स्नान: सुबह स्नान करने के पश्चात दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुशा, जल, दूध और काले तिल से पितरों का स्मरण करते हुए जल (तर्पण) अर्पित किया जा सकता है।
- पूर्वाभ्यास और तैयारी: सुबह भोजन पकाने की सामग्री की व्यवस्था, सात्विक तैयारी और पितरों के नाम का दीप जलाकर ऑफिस निकला जा सकता है; जबकि मुख्य ब्राह्मण भोजन और पंचबलि भोग दोपहर के कुतुप काल में ही लगाया जाना चाहिए।
कौन-कौन कर सकता है तर्पण?
- शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार तर्पण करने का अधिकार निम्नलिखित सदस्यों को है-
- पुत्र: पिता और अपने पूर्वजों के तर्पण का प्रथम और मुख्य अधिकार ज्येष्ठ या अन्य पुत्रों का होता है।
- पौत्र/प्रपौत्र: पुत्र के न होने या अनुपलब्ध होने पर पोता या परपोता तर्पण कर सकता है।
- भाई और करीबी रिश्तेदार: विशेष परिस्थितियों में भाई या सपिंड रिश्तेदार तर्पण कर सकते हैं।
- पत्नी: पति के न रहने या अनुपस्थित होने पर कई परंपराओं में पत्नी को तर्पण का अधिकार है।
- पुत्री (बेटी): कई कुलों और धार्मिक मान्यताओं में संतान के रूप में बेटियां भी अपने माता-पिता या पितरों का तर्पण व श्राद्ध संपन्न करती हैं।
(नोट: यह रिपोर्ट सनातन धर्मशास्त्रों, पंचांगीय कुतुप काल के नियमों और ज्योतिषाचार्यों के व्यावहारिक सुझावों पर आधारित है।)
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