धर्म डेस्क। महाभारत का युद्ध इतिहास के सबसे विनाशकारी और रणनीतिक युद्धों में से एक माना जाता है। इस युद्ध में कई ऐसे महारथी थे, जिन्हें पराजित करना साक्षात देवताओं के लिए भी असंभव था। इन्हीं में से एक थे माता कुंती और सूर्य देव के पुत्र ‘दानवीर कर्ण’। अपनी अटूट वफादारी, अद्वितीय धनुर्विद्या और दानवीरता के लिए प्रसिद्ध कर्ण को परास्त करने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को भी विशेष रणनीतियां बनानी पड़ी थीं।
पौराणिक इतिहास के अनुसार, कुरुक्षेत्र के मैदान में कर्ण की पराजय उनकी कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि उनके जीवन में मिले तीन बड़े और अचूक श्रापों की वजह से हुई थी। महाभारत के ‘कर्ण पर्व’ और ‘शांति पर्व’ में इन तीन श्रापों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो अंततः उनकी मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बने।
1. भगवान परशुराम का श्राप
कर्ण ने अपनी जाति छिपाकर भगवान परशुराम से ब्रह्मास्त्र और अन्य अत्यंत शक्तिशाली दिव्य अस्त्रों की शिक्षा प्राप्त की थी। एक दिन जब गुरु परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे, तब एक तीखा कीड़ा (माना जाता है कि वह इंद्र देव थे) कर्ण की जांघ पर काटने लगा। गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण ने असहनीय दर्द सहते हुए भी अपने पैर को बिल्कुल नहीं हिलाया।
जब परशुराम जी की आंख खुली और उन्होंने कर्ण के साहस तथा रक्त को देखा, तो वे तुरंत समझ गए कि इतनी कठोर सहनशक्ति केवल किसी क्षत्रिय में ही हो सकती है, ब्राह्मण में नहीं।
क्रोधित होकर परशुराम जी ने कर्ण को श्राप दिया कि जिस छल से तुमने यह विद्या सीखी है, जब जीवन के सबसे कठिन संकट (युद्ध) के समय तुम्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब तुम यह सारी दिव्य अस्त्र विद्या भूल जाओगे। इसी कारण महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण ब्रह्मास्त्र का संधान नहीं कर सके।
2. निर्दोष बछड़े का वध और ब्राह्मण का श्राप
एक अन्य पौराणिक घटना के अनुसार, कर्ण एक बार शब्दभेदी बाण चलाने का कड़ा अभ्यास कर रहे थे। इसी दौरान उनका एक बाण अनजाने में एक निर्दोष बछड़े को जा लगा, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
उस गाय के स्वामी (एक ब्राह्मण) ने जब अपने बछड़े की यह दशा देखी, तो उन्होंने अत्यधिक क्रोध और शोक में आकर कर्ण को श्राप दे दिया। ब्राह्मण ने कहा कि जिस तरह तुमने एक असहाय और बेकसूर पशु को मारा है, ठीक उसी तरह जब तुम अपने जीवन के सबसे बड़े युद्ध में होगे, तब तुम्हारे रथ का पहिया दलदल में फंस जाएगा और तुम असहाय स्थिति में मारे जाओगे।
3. बच्ची की मदद और धरती माता का क्रोध
एक बार कर्ण ने मार्ग में एक छोटी बच्ची को बिलखते हुए देखा। उसका घी मिट्टी में गिर गया था और वह डांट के डर से रो रही थी। बच्ची की पीड़ा देखकर कर्ण ने उस स्थान की मिट्टी को अपने हाथों में उठाया और उसे इतनी जोर से निचोड़ा कि सारा घी वापस बर्तन में आ गया।
इस प्रक्रिया में मिट्टी को अत्यधिक दबाए जाने के कारण धरती माता को तीव्र पीड़ा हुई। तब पृथ्वी देवी ने प्रकट होकर कर्ण से कहा कि तुमने एक बच्ची के लिए मुझे असहनीय दर्द दिया है। इसके परिणामस्वरूप, मैं तुम्हें श्राप देती हूं कि युद्ध के निर्णायक क्षण में मैं तुम्हारे रथ के पहिए को पूरी ताकत से जकड़ लूंगी और लाख कोशिशों के बाद भी तुम्हें उससे मुक्त नहीं होने दूंगी।
17वें दिन एक साथ सक्रिय हुए तीनों श्राप
कुरुक्षेत्र के युद्ध के 17वें दिन जब अर्जुन और कर्ण के बीच महासंग्राम चल रहा था, तब ये तीनों श्राप एक साथ प्रभावी हो गए। धरती मां के श्राप से रथ का पहिया जमीन में धंस गया, ब्राह्मण के श्राप के कारण कर्ण असहाय होकर रथ से नीचे उतरे और परशुराम के श्राप के चलते वे रथ का पहिया निकालते समय अर्जुन पर प्रहार करने के लिए मंत्र भूल गए। इसी विवशता का लाभ उठाकर भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने तीर चला दिया और इस तरह एक महान योद्धा का अंत हुआ।








