रामनाथ मुटकुळे, नईदुनिया, इंदौर। सनातन संस्कृति में श्रावण को पवित्र माह माना जाता है। यह माह भगवान शिव की भक्ति को समर्पित रहता है। श्रावण में महादेव का जलाभिषेक करने की प्राचीन परंपरा है। इस माह में भक्त कांवड़ में पवित्र नदियों का जल लेकर प्राचीन शिव मंदिरों में पहुंचते हैं और भगवान का जलाभिषेक करते हैं। मालवा-निमाड़ में कांवड़ यात्रा को प्रधानता प्रात:स्मरणीय देवी अहिल्याबाई होलकर ने दी थी। उनके समय में श्रावण मास में भगवान शिव के अभिषेक के लिए गंगोत्री से प्रतिदिन गंगाजल आता था, जिससे वे महादेव का जलाभिषेक करती थीं।
मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा की शुरुआत का सीधा संबंध समुद्र मंथन से है। सावन माह में ही देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इसमें सबसे पहले ‘हलाहल’ नामक भयंकर विष निकला, जिसकी तीव्रता पूरी सृष्टि को भस्म कर सकती थी। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को स्वयं पी लिया और अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया, जिससे उनका नाम ‘नीलकंठ’ पड़ा।
जल चढ़ाने से भोलेनाथ को शीतलता मिली और विष का असर शांत हुआ
विष के तीव्र प्रभाव से भगवान शिव का शरीर अत्यधिक तपने लगा और उनका कंठ जलने लगा। महादेव के शरीर के ताप को कम करने और उन्हें राहत पहुंचाने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर पवित्र नदियों का जल अर्पित करना शुरू कर दिया। जल चढ़ाने से भोलेनाथ को शीतलता मिली और विष का असर शांत हुआ। यह पूरी घटना सावन के महीने में ही हुई थी, इसलिए तभी से सावन में भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करने और कांवड़ यात्रा निकालने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
पौराणिक ग्रंथों में पहले कांवड़िया को लेकर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। कई मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम सबसे पहले कांवड़िया थे। वे गढ़मुक्तेश्वर से कांवड़ में गंगाजल लेकर आए थे। उन्होंने बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। कुछ धार्मिक ग्रंथों में भगवान श्री राम और श्रवण कुमार को भी पहला कांवड़िया माना गया है।
प्रतिदिन भगवान शिव के अभिषेक के लिए गंगाजल पहुंचता था
पूरे श्रावण मास में प्रतिदिन गंगोत्री से गंगाजल मंगवाने के लिए देवी अहिल्याबाई होलकर ने कुछ लोगों की नियुक्ति कर रखी थी, जो गंगोत्री से कांवड़ में गंगाजल लेकर घोड़े से चलते थे और रास्ते में दूसरे साथी के हवाले करते थे। इस तरह ऐसी व्यवस्था की गई थी कि प्रतिदिन भगवान शिव के अभिषेक के लिए गंगाजल पहुंचता था। गंगा नदी का पवित्र जल अहिल्याबाई ने केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे दूरस्थ स्थानों पर स्थित शिव मंदिरों में अभिषेक के लिए भिजवाया। मुगल शासनकाल के समय में भी उन्होंने इस परंपरा को न केवल जीवंत रखा, बल्कि प्रमुखता से आगे भी बढ़ाया।
कांवड़ यात्रा केवल एक पैदल यात्रा नहीं, बल्कि यह कड़े नियमों, शुद्धता, भक्ति और आत्म-संयम का प्रतीक है। अश्वमेध यज्ञ के समान फल: धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, सावन के महीने में श्रद्धापूर्वक कांवड़ यात्रा पूरी करने से श्रद्धालु को अश्वमेध यज्ञ करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि जो भक्त इस कठिन यात्रा को पूरा करके शिवजी का जलाभिषेक करते हैं, महादेव उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
भगवान शिव को अर्पित कर दी थी खासगी संपत्ति
मां अहिल्या भगवान शिव की परम भक्त थीं। उन्होंने अपने राज्य और अपनी खासगी संपत्ति पर बेल पत्र रखकर भगवान शिव को अर्पित कर दिया था। वे शिवलिंग को अपने साथ रखकर भगवान शिव के नाम पर ही राज्य का संचालन करती थीं। उन्होंने शिव को केवल पूजा नहीं, अपने जीवन में भी उतारा। उनके देवघर में सोने की जलाधारी में नौ रत्नों के शिवलिंग आज भी इंदौर के राजवाड़ा में मौजूद हैं। उनके राज्य की राजधानी महेश्वर में सोने के पालने में शिवलिंग रूप में महादेव झूलते थे।
महेश्वर में नर्मदा के तट पर पार्थिव शिवलिंग की पूजा-अर्चना उन्होंने ही आरंभ करवाई। आटे के शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा-अर्चना कर नर्मदा में प्रवाहित करने की परंपरा भी उन्होंने प्रारंभ की। पूजा-अर्चना के बाद आटे के ये शिवलिंग नर्मदा नदी में प्रवाहित कर दिए जाते थे, जो मछलियों का भोजन बनते थे। इस प्रकार वे नदी के जलचरों का भी पूरा ध्यान रखती थीं। उनके कार्यकाल के दौरान श्रावण मास में प्रतिदिन महेश्वर तट पर ब्राह्मण सवा लाख शिवलिंग तैयार कर उनका विधिविधान से अभिषेक और पूजन करते थे।
देशभर में 8527 धार्मिक स्थलों का निर्माण और जीर्णोद्धार करवाया
प्रतिदिन शिव पूजन, ब्राह्मणों सम्मान और उन्हें भोजन कराने के साथ ही दान-दक्षिणा भी देती थीं। मुगल आक्रांताओं के देशभर में विध्वंस के बाद खंडित मंदिरों का जीर्णोद्धार कर उन्होंने सनातन संस्कृति को नया आधार प्रदान किया। उन्होंने अपने कार्यकाल में देशभर में 8527 धार्मिक स्थल और 39 अनाथालय का निर्माण कराया। साथ ही धर्मशालाओं, नर्मदा किनारे, देश में प्रमुख धर्मस्थलों पर नदियों किनारे के घाटों, कुंए, तालाब, बावड़ियों और गोशालाओं के निर्माण में भी सहयोग किया। ये सभी कार्य उनकी खासगी (निजी) संपत्ति से किया गया।
होलकर वंश के प्रथम शासक मल्हारराव को पेशवा बाजीराव ने जागीर प्रदान की थी। वहीं उनकी पत्नी गौतमा बाई को भी कुछ गांवों से कर वसूली के अधिकार दिए गए थे, जिससे होने वाली आय का वे अपने निजी और धार्मिक कार्य में उपयोग करती थीं। 20 जनवरी 1734 के एक पत्र अनुसार गौतमाबाई को खासगी से आरम्भ में आमदनी 2 लाख 99 हजार 10 रुपए हुई थी। गौतमाबाई के निधन के बाद इस खासगी की आय का काम अहिल्या बाई देखती थीं। यह खासगी ट्रस्ट आज की कायम है जो धार्मिक स्थलों की व्यवस्था देखता है। भगवान शिव के प्रति उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि इसके चलते अहिल्या बाई ने महेश्वर को राजधानी बनाया। अहिल्या बाई ने जब राज्य का कार्यभार संभाला तो उस समय राज्य की स्थिति काफी नाजुक थी।
अहिल्या की शिवभक्ति से प्रभावित हुए थे मल्हार राव

महारानी अहिल्याबाई होलकर का व्यक्तित्व व कृतित्व उन्हें विश्व की श्रेष्ठतम महिलाओं की पंक्ति में अग्रणी बनाता है। देवी अहिल्या नगर (अहमदनगर) के छोटे-से चौंडी ग्राम में जन्मी छोटी सी सौम्य, शांत, तेजवान बालिका ने मालवा के सूबेदार मल्हारराव को अपनी शिव भक्ति से इस कदर प्रभावित किया कि उसे वे अपने पुत्र खंडेराव से विवाह करवाकर बहू बनाकर इंदौर ले आए। मल्हार राव के निधन के बाद रानी अहिल्याबाई ने राज्य का शासन-भार संभाला।
वे प्रजा को अपनी संतान मानती थीं। वे राहगीरों, गरीबों, विकलांगों, साधु-संतों, पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं सभी का ध्यान रखती थीं, यहां तक कि अपने सैनिकों, कर्मचारियों के कल्याण के लिए भी वह कभी पीछे नहीं हटीं। उनकी धार्मिकता इतनी उदार थी कि धर्म व नीति के हर क्षेत्र में उन्होंने अपना नाम अजर-अमर कर दिया। उनका दान-धर्म इतना महान था कि वैसा दान-धर्म आज तक हिंदुस्तान में किसी ने भी नहीं किया।
तीर्थस्थानों पर धर्मशालाएं बनवाई तो कई पवित्र नदियों के किनारे बड़े-बड़े और सुंदर घाट बनवाए
सर्वप्रथम उन्होंने शिव मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया। इनमें 11वीं सदी में महमूद गजनी और 17वीं सदी में औरंगजेब द्वारा तोड़े गए सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार उन्होंने वर्ष 1783 में करवाया। आज भी यहां अहिल्याबाई द्वारा निर्मित मंदिर ‘जूना सोमनाथ’ या ‘अहिल्यादेवी मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर मुख्य सोमनाथ मंदिर से मात्र 200 मीटर दूर है। इनके अलावा अहिल्यादेवी ने श्रीनगर, हरिद्वार, केदारनाथ, बद्रीनाथ, ऋषिकेश, प्रयाग, वाराणसी, नैमिषारण्य, पुरी, रामेश्वरम, सोमनाथ, नाशिक, ओंकारेश्वर, महाबलेश्वर, पुणे, इंदौर, श्रीशैलम, उडीपी, गोकर्ण, काठमांडू में कई स्थानों पर मंदिरों का निर्माण करवाया। उन्होंने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया तो कई नए मंदिरों का निर्माण भी करवाया। कई तीर्थस्थानों पर धर्मशालाएं बनवाई तो कई पवित्र नदियों के किनारे बड़े-बड़े और सुंदर घाट बनवाए।
उज्जैन में उन्होंने चिंतामणि गणपति के मंदिर का भी निर्माण करवाया। एलोरा, महाराष्ट्र में वर्ष 1780 के आस-पास घृष्णेश्वर मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। नर्मदा नदी के किनारे होने से उन्हें महेश्वर बहुत प्रिय था। उन्होंने यहां कई प्राचीन मंदिरों, घाटों आदि का जीर्णोद्धार कराया। इसके अलावा, कई नए मंदिर, घाट व मकान बनवाए। उन्होंने महेश्वर में अक्षय तृतीया के शुभ दिन घाट पर भगवान परशुराम का मंदिर बनवाया। जगन्नाथपुरी मंदिर को दान और आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम सहित महाराष्ट्र में परली वैजनाथ ज्योतिर्लिंग का भी कायाकल्प करवाया।
अहिल्याबाई होलकर परम शिव भक्त थी। उनकी राजाज्ञाओं पर ‘श्री शंकर आज्ञा’ लिखा रहता था। उनका मानना था कि ‘सत्ता मेरी नहीं, सम्पत्ति भी मेरी नहीं, जो कुछ है भगवान का है और उसके प्रतिनिधि स्वरूप समाज का है।’ 8 मार्च 1787 के ‘बंगाल गजट’ में यह लिखा गया है कि देवी अहिल्या की मूर्ति भी सर्वसामान्य द्वारा देवी रूप से प्रतिष्ठित व पूजित की जाएंगी।







