एक ऐसा योद्धा जिसके पास अस्त्र-शस्त्रों और मायावी शक्तियों का असीम भंडार था, उसका अंत कैसे हुआ? जानिए …और पढ़ें
Publish Date: Mon, 27 Apr 2026 05:27:58 PM (IST)Updated Date: Mon, 27 Apr 2026 05:27:58 PM (IST)
HighLights
- आखिर लक्ष्मण ही क्यों कर पाए इंद्रजीत का वध
- मनुष्य नहीं ले सकता था रावण के पुत्र के प्राण?
- मर्यादा पुरुषोत्तम के भाई लक्ष्मण महान संकल्प
धर्म डेस्क। रामायण के युद्ध में रावण की सेना का सबसे भयानक योद्धा और उसका ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद था। उसकी शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने साक्षात स्वर्गराज इंद्र को परास्त कर बंदी बना लिया था, जिसके कारण ब्रह्मा जी ने उसे ‘इंद्रजीत’ की उपाधि दी थी।
परंतु, एक ऐसा योद्धा जिसके पास अस्त्र-शस्त्रों और मायावी शक्तियों का असीम भंडार था, उसका अंत कैसे हुआ? इसके पीछे छिपा है एक कठिन वरदान और लक्ष्मण जी का 14 वर्षों का अखंड तप।
ब्रह्मा जी का वरदान और वह असंभव शर्त
रामचरितमानस के लंका कांड के प्रसंगों के अनुसार, मेघनाद ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर अजेय होने का वरदान मांगा था। ब्रह्मा जी ने उसे वरदान देते समय एक ऐसी शर्त रख दी जो किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए असंभव प्रतीत होती थी। शर्त के अनुसार, मेघनाद का वध केवल वही कर सकता था जिसने:
- लगातार 14 वर्षों तक निद्रा का त्याग किया हो।
- इन 14 वर्षों में किसी पराई स्त्री का मुख न देखा हो।
- जिसने 14 वर्षों तक भोजन ग्रहण न किया हो।
- मेघनाद को अहंकार था कि पृथ्वी पर ऐसा कोई संयमी पुरुष जन्म ही नहीं ले सकता, जो इन कठिन शर्तों को पूरा कर सके।
लक्ष्मण: शर्तों को पूरा करने वाले एकमात्र योद्धा
मेघनाद जिसे अपनी जीत का आधार मान रहा था, वही उसकी मृत्यु का कारण बना। भगवान श्री राम के भाई लक्ष्मण ने अनजाने में ही अपनी सेवा और भक्ति से इन शर्तों को सिद्ध कर दिया था:
- निद्रा पर विजय: वनवास के पहले दिन ही लक्ष्मण ने तय किया था कि वे भैया राम और माता सीता की सुरक्षा के लिए कभी नहीं सोएंगे। उन्होंने ‘निद्रा देवी’ से प्रार्थना की थी कि उनके हिस्से की नींद उनकी पत्नी उर्मिला को दे दी जाए। इसी कारण लक्ष्मण को ‘गुडाकेश’ (नींद को जीतने वाला) कहा जाता है।
- मर्यादा और संयम: लक्ष्मण जी ने 14 वर्षों तक कभी माता सीता के मुख को नहीं देखा। जब सुग्रीव ने सीता जी के आभूषण दिखाए, तो लक्ष्मण ने केवल उनके ‘नूपुर’ (पायल) पहचाने, क्योंकि वे प्रतिदिन केवल माता के चरणों को ही स्पर्श करते थे।
अंतिम युद्ध और निकुंभला यज्ञ
मेघनाद अपनी शक्तियों को और अधिक घातक बनाने के लिए ‘निकुंभला देवी’ का गुप्त यज्ञ कर रहा था। विभीषण ने श्री राम को आगाह किया कि यदि यह यज्ञ संपन्न हो गया, तो मेघनाद को कोई भी शक्ति नहीं मार पाएगी।
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विभीषण के मार्गदर्शन में लक्ष्मण जी ने यज्ञ स्थल पर धावा बोलकर उसे भंग कर दिया। यज्ञ अधूरा रह जाने से मेघनाद की मायावी शक्तियां क्षीण हो गईं। अंततः, एक भीषण संग्राम के बाद लक्ष्मण जी ने अपने बाणों से मेघनाद का मस्तक धड़ से अलग कर दिया, और इस तरह एक अहंकारी अति-महारथी का अंत हुआ।
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