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रावण को मिले थे ये 4 भयंकर श्राप, जिसके कारण सोने की लंका जलकर हो गई थी पूरी तरह खाक

रावण को मिले थे ये 4 भयंकर श्राप, जिसके कारण सोने की लंका जलकर हो गई थी पूरी तरह खाक

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण काल का सबसे शक्तिशाली राजा लंकापति रावण अपनी शक्तियों और विद्वता के लिए जाना जाता था। लेकिन अंततः उसका सर्वनाश भगवान श्रीराम के बाणों से पहले उसके खुद के अहंकार और अधर्म के कारण हुआ। अत्यधिक शक्तियां होने के मद में चूर रावण ने अपने जीवनकाल में कई घोर अत्याचार किए। इन पापों के परिणामस्वरूप उसे समय-समय पर कुछ ऐसे भयंकर श्राप मिले, जिन्होंने उसकी लंका को मटियामेट कर दिया और उसके समूल वंश का नाश कर दिया।

वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में वर्णित उन 4 प्रमुख श्रापों की गाथा नीचे दी गई है, जिन्होंने रावण की नियति तय की…

नंदी जी का श्राप: वानर ही बने लंका के विनाश का माध्यम

एक बार रावण भगवान शिव से मिलने के लिए कैलाश पर्वत गया था। वहां द्वार पर पहरा दे रहे नंदी जी के स्वरूप को देखकर रावण उनका उपहास उड़ाने लगा और अट्टहास करने लगा। इस घोर अपमान से क्रोधित होकर नंदी जी ने रावण को श्राप दिया, “जिस वानर रूप का तू आज मजाक उड़ा रहा है, वही वानर प्रजाति एक दिन तेरी इस सोने की लंका के विनाश का मुख्य कारण बनेगी।” इसी श्राप के चलते आगे चलकर हनुमान जी ने लंका का दहन किया और वानर सेना ने रावण का घमंड चूर-चूर कर दिया।

सती वेदवती का श्राप: जिसने माता सीता के रूप में लिया जन्म

वेदवती नाम की एक परम पवित्र स्त्री भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। वन में तपस्यारत वेदवती के अप्रतिम सौंदर्य को देखकर रावण की कामुक नजरें उन पर टिक गईं। रावण ने जबरदस्ती उनकी तपस्या भंग करने का प्रयास किया और उनके बाल पकड़ लिए। स्वयं को अपवित्र मानकर वेदवती ने उसी क्षण योगअग्नि द्वारा खुद को भस्म कर लिया। लेकिन भस्म होने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया, “दुष्ट! तेरे सर्वनाश के लिए मैं दोबारा जन्म लूंगी।” धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगले जन्म में वही वेदवती माता सीता के रूप में प्रकट हुईं, जिनका हरण करना रावण की मृत्यु का अंतिम कारण बना।

नलकुबेर का श्राप: जिसने माता सीता की अस्मत की रक्षा की

स्वर्ग लोक पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से जब रावण ने आक्रमण किया, तो उसकी दृष्टि स्वर्ग की अप्सरा रंभा पर पड़ी। रंभा रिश्ते में रावण के भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर की पत्नी (यानी रावण की पुत्रवधू के समान) थीं। रावण ने अपनी मर्यादा भूलकर रंभा की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ दुराचार किया। जब इस बात का पता नलकुबेर को चला, तो उन्होंने अत्यंत क्रोधित होकर रावण को श्राप दिया, “आज के बाद यदि तूने किसी भी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे स्पर्श भी किया, तो तेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे।” इसी श्राप के डर से रावण अशोक वाटिका में रखने के बाद भी माता सीता को कभी छू नहीं पाया।

माया का श्राप: सुहाग उजाड़ने की मिली सजा

रावण की पटरानी मंदोदरी की बहन का नाम माया था, जिनका विवाह वैजयंतपुर के राजा शंबर से हुआ था। दिग्विजय यात्रा के दौरान लंकापति रावण ने राजा शंबर का वध कर दिया और अपनी ही सगी साली माया को बंधक बनाकर अपने साथ ले जाने लगा। अपनी आंखों के सामने पति की हत्या से अत्यंत दुखी और क्रोधित होकर माया ने रावण को श्राप दिया, “तुमने अपने ही कुल की स्त्री का सुहाग उजाड़ा है। याद रखना, तुम्हारी यही पर-स्त्री वासना एक दिन तुम्हारी अकाल मृत्यु और तुम्हारी सोने की लंका के समूल विनाश का कारण बनेगी।”

यही वजह है कि सनातन संस्कृति में माना जाता है कि रावण को मिले इन चार भयंकर श्रापों ने उसकी मति को भ्रमित कर दिया और अंततः अधर्म के मार्ग पर चलकर महाप्रतापी रावण का अंत हो गया।

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