बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और देवी-देवताओं के पारंपरिक संबंधों का जीवंत उदाहरण है।
Publish Date: Mon, 19 Oct 2026 09:11:56 PM (IST)Updated Date: Mon, 19 Oct 2026 09:17:44 PM (IST)
HighLights
- बस्तर दशहरा पसरा में देवी-देवताओं की व्यवस्था में जुटे कार्मिक
- माओवाद के खात्मे के बाद बस्तर दशहरा में बढ़ेगी देव-आस्था।
- पिछले साल करीब 1700 देवी-देवताओं की उपस्थिति दर्ज की गई थी।
अनूप श्रीवास्तव: जगदलपुर। बस्तर की धरती पर जब आस्था का सबसे बड़ा पर्व बस्तर दशहरा सजता है, तो यहां सिर्फ रथ, रस्में और परंपराएं ही नहीं, बल्कि पूरे संभाग की सांस्कृतिक एकजुटता भी नजर आती है। अब माओवाद के खात्मे के बाद बदलते बस्तर में इस ऐतिहासिक पर्व को लेकर एक नई उम्मीद दिखाई दे रही है। दशकों तक माओवाद के प्रभाव और असुरक्षा की चुनौतियों से जूझते रहे बस्तर के दूरस्थ अंचलों से इस बार अधिक संख्या में देवी-देवताओं के दशहरा में शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है। पिछले साल करीब 1700 देवी-देवताओं की उपस्थिति दर्ज की गई थी, जबकि इस बार यह आंकड़ा बढ़ने की संभावना है। बस्तर दशहरा से जुड़े जिम्मेदार सत्यनारायण सेठिया और घनश्याम के अनुसार, इस बार देवी-देवताओं के आगमन को लेकर विशेष उम्मीद है।
आस्था के साथ दिखेगी बदलते बस्तर की तस्वीर
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और देवी-देवताओं के पारंपरिक संबंधों का जीवंत उदाहरण है। संभाग के विभिन्न गांवों और अंचलों से देवी-देवताओं का आगमन इस पर्व को विशिष्ट बनाता है। माओवाद के खात्मे के बाद अधिक देवी-देवताओं के पहुंचने की उम्मीद को बस्तर की सांस्कृतिक गतिविधियों के विस्तार और पारंपरिक आयोजनों में भागीदारी की संभावना के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इस बार वास्तविक संख्या कितनी होगी, यह देवी-देवताओं के आगमन के बाद ही स्पष्ट होगा।
500 क्विंटल चावल सहित राशन और पूजा सामग्री की व्यवस्था
बस्तर दशहरा में शामिल होने वाले देवी-देवताओं के साथ आने वाले पुजारियों और सेवादारों के लिए राशन, वस्त्र और पूजा सामग्री उपलब्ध कराने की परंपरा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पिछले साल करीब 500 क्विंटल चावल के साथ दाल, नमक, घी, तेल, हल्दी और वस्त्र सहित आवश्यक सामग्री प्रदान की गई थी। इसके अलावा पूजा-अर्चना के लिए अगरबत्ती, घी, नारियल, सिंदूर और अन्य पूजन सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है। इस बार देवी-देवताओं की संख्या बढ़ने की संभावना को देखते हुए सामग्री की जरूरत और व्यवस्था का दायरा भी बढ़ सकता है।
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मां भंडारिन देवी की स्थापना के बाद शुरू होती है सेवा की परंपरा
बस्तर दशहरा की परंपरा में मां भंडारिन देवी की स्थापना का विशेष महत्व है। मान्यता और परंपरा के अनुसार, मां भंडारिन देवी की स्थापना के बाद ही दशहरा में आने वाले देवी-देवताओं के लिए राशन, पूजा सामग्री और वस्त्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था शुरू होती है। बताया जाता है कि यह परंपरा पिछले 617 वर्षों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
राजुरगांव के पुजारी निभाते हैं सदियों पुरानी परंपरा
जानकारी के अनुसार, राजुरगांव निवासी पुजारी हर साल निर्धारित विधि-विधान के साथ मां भंडारिन देवी की स्थापना करने पहुंचते हैं। इस वर्ष भी स्थापना की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। परंपरा से जुड़े लोगों का कहना है कि मां भंडारिन देवी की स्थापना के बाद से बस्तर दशहरा की धार्मिक परंपराओं में कभी विराम नहीं आया। रियासतकाल से चली आ रही यह आस्था आज भी उसी निरंतरता के साथ कायम है।
रियासतकालीन विरासत से आधुनिक बस्तर तक आस्था का सफर
- बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पर्व बदलते समय के बीच भी अपनी पारंपरिक पहचान बनाए हुए है।
- मां भंडारिन देवी की स्थापना से लेकर दूर-दराज के गांवों के देवी-देवताओं के आगमन और उनके लिए राशन-पानी की व्यवस्था तक, हर परंपरा इस आयोजन की सामुदायिक भावना को दर्शाती है।
- इस बार अधिक देवी-देवताओं के पहुंचने की उम्मीद के बीच बस्तर दशहरा एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक विरासत और जनजातीय आस्था का व्यापक स्वरूप सामने ला सकता है।
- माओवाद के बाद के बस्तर में यह आयोजन सांस्कृतिक जीवन की निरंतरता और परंपराओं से जुड़े रहने की भावना का भी प्रतीक बनेगा।







