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आज के दिन पंडित नेहरू ने तुड़वाया था गाड़ियां लोहारों का प्रण
चित्तौड़गढ़। 6 अप्रैल का दिन चित्तौड़गढ़ के लिए भी विशेष है। आज ही के दिन यानी 6 अप्रैल 1955 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में साथ देने वाल गाड़ियां लोहार परिवारों को किले पर चढ़ाकर उस प्रण को तुड़वाने का कार्य किया था, जिसमें उन्होंने यह प्रण लिया था कि जब तक मेवाड़ मुगलों से आजाद नहीं होगा वह चित्तौड़गढ़ किले पर नहीं चढ़ेंगे, पक्के मकान में नहीं रहेंगे और बैलगाड़ी में ही अपना जीवन बसर करेंगे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रण को तुड़वाने के लिए 6 अप्रैल 1955 को कुछ गाड़ी लोहार को लेकर किले पर चढ़ाई की थी हालांकि उसमें मेवाड़ के गाड़ी लोहार के बजाय गुजरात और अन्य प्रदेश से आए हुए गाड़ी लोहार थे।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं राष्ट्रीय स्तर के कवि डॉक्टर मेघ राज मुकुल ने प्रतिज्ञारत गाड़ियां लोहार परिवारों के सम्मान में विजय स्तंभ के नीचे इसी कार्यक्रम में एक कविता पड़ी थी, जिसका शीर्षक था,पहिया चलता रहा जिंदगी, हंस हंस रोवे गाड़ी में .सास-बहू की बहू-सास की लाज बचाए गाड़ी में। गाड़ियां लोहार को दुर्ग पर चढ़ाने के इस दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गाड़ी लोहार के रोजगार के लिए चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन के पास और मीठा राम जी का खेड़ा जो अभी प्रताप नगर के नाम से जाना जाता है, वहां पर कई बीघा जमीन आवंटित की, उनके लिए कारखाना बनाया एवं उनको रोजगार से जोड़कर एक जगह रुकने के लिए अनुरोध किया। इस हेतु गाड़ी लोहार सेवा संघ की स्थापना भी की गई तथा गाड़ी लोहार समाज के बच्चों के लिए प्रताप नगर चौराहे पर एक स्कूल भी बनाया, जो आज भी विद्यमान है। चूंकि यह गाड़ी लोहार मेवाड़ के नहीं थे इसलिए कुछ समय बाद यहां से चले गए थे और कालांतर में पंडित नेहरू द्वारा आवंटित इस जमीन पर भू कारोबारियो का कब्जा हो गया। रेलवे स्टेशन के बाहर और रेलवे स्टेशन के सामने जो जमीन गाड़ी लोहार परिवारों के लिए आवंटित हुई थी जिस पर अभी गाड़ी लोहार कॉलोनी बनी हुई है, बड़े-बड़े मॉल बने हुए हैं।

विडंबना तो यह है कि वर्तमान गाड़ी लोहार कॉलोनी प्रताप नगर और रेलवे स्टेशन रोड वाले यह प्लॉट यह जमीन वर्तमान में मकान और माल बनाने वालों ने किससे खरीदी, इसका भी कोई पता नहीं, यही नहीं गाड़ी लोहार परिवारों के लिए जो स्कूल बनाया गया था, उसमें भी समाज कल्याण विभाग एवं अन्य विभाग चलते हैं तथा इसी स्कूल के ठीक सामने गाड़ी लोहार टपरी बनाकर आज भी रह रहे हैं और अपने स्कूल की ओर ताकते रहते हैं जो उनके लिए बनाया था। गाड़िया लोहार परिवारों के शोषण की पराकाष्ठा तो तब हुई है जब कि इन परिवारों की सेवा के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जिस गाड़ी लोहार सेवा संघ की स्थापना की थी। उन्होंने भी अपना फर्ज पूरा नहीं निभाया तथा कुछ वर्षों पूर्व चित्तौड़गढ़ में उनकी दुर्दशा देखकर जांबाज कलेक्टर ने गाड़ी लोहार सेवा संघ के पदाधिकारी को बताया कि सारा हिसाब किताब लेकर ऑफिस में आ जाए, नहीं तो फौजदारी कार्रवाई होगी, लेकिन रातों-रात इन कलेक्टर महोदय का तबादला हो गया और कार्यालय समय खुलने से पहले ही नए कलेक्टर साहब ने ज्वाइन कर लिया था।

कई दशकों के बाद ब्यावर निवासी भारतीय सेवा के फौजी हवलदार कालूसिंह चौहान घड़ियाल लोहार ने गाड़ी लोहार को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया, करीब 25 वर्ष पूर्व उन्होंने गांव-गांव घूम कर चित्तौड़गढ़ निंबाहेड़ा रोड पर एवं नीमच मध्य प्रदेश में गाड़िया लोहार कॉलोनी की स्थापना की चित्तौड़गढ़ में गाड़ी लोहार समाज के बच्चों को प्रताप नगर गाड़ी अलवरी स्कूल में प्रवेश दिलाया एवं ऊपर उनको अवश्य व्यवस्था शुल्क कराई जो ज्यादा दिन चल नहीं पाई और आज पूरे चित्तौड़गढ़ जिले में एवं राजस्थान में कई गाड़ी लोहार सड़कों के किनारे अपनी खाट डालकर तंबू डालकर निवास कर रहे हैं।उनके लिए 1955 में प्रधानमंत्री द्वारा आवंटित जमीन पर भू कारोबारीयो के कब्जे हो चले।
6 अप्रैल 1955 का यह दिन वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के साथी गाड़ी लोहार के लिए स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए और वर्तमान सनातन धर्म वाली सरकार को उनकी दुर्दशा पर विचार करके उनकी जमीन को कब्जाने वालों को बेदखल करके इनको पुनर्स्थापित कर गाड़ी लोहार सेवा संघ चित्तौड़गढ़ की स्थापना से लेकर अब तक के कार्यकलापों की सोशल ऑडिट कर इनको न्याय दिलाना चाहिए। आज भी इनको उम्मीद है कि फिर कोई मसीहा आएगा और उनको विधवा पेंशन, बुजुर्ग पेंशन, विकलांग के लिए ट्राईसाईकिल और एक बिजली का बल्ब है उनकी झोपड़ी में लगवाकर न्याय दिलाएगा।
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