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एक दिन में तीन बार बदलता है मां धारी देवी का रूप, चारधाम यात्रा से जुड़ी है खास मान्यता

एक दिन में तीन बार बदलता है मां धारी देवी का रूप, चारधाम यात्रा से जुड़ी है खास मान्यता

अलकनंदा नदी के किनारे स्थित धारी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है। …और पढ़ें

Publish Date: Sat, 09 May 2026 03:27:51 PM (IST)Updated Date: Sat, 09 May 2026 03:27:51 PM (IST)

धारी देवी की मूर्ति दिन में तीन बार बदलती है रूप

HighLights

  1. धारी देवी की मूर्ति दिन में तीन बार बदलती है रूप
  2. मंदिर को चारधाम का रक्षक माना जाता है
  3. 2013 की केदारनाथ त्रासदी से भी जुड़ी है मान्यता

धर्म डेस्क। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित धारी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है। यह प्राचीन मंदिर देवी काली को समर्पित है और इसे चारधाम का रक्षक भी कहा जाता है। श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच स्थित यह मंदिर न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि देशभर में अपनी रहस्यमयी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है।

मूर्ति दिन में तीन बार अपना स्वरूप बदलती है

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर में स्थापित मां धारी देवी की मूर्ति दिन में तीन बार अपना स्वरूप बदलती है। कहा जाता है कि सुबह देवी बालिका के रूप में दिखाई देती हैं, दोपहर में उनका स्वरूप युवती जैसा हो जाता है और शाम तक वह वृद्ध महिला के रूप में नजर आती हैं। यही रहस्य इस मंदिर को बाकी शक्तिपीठों से अलग बनाता है।

पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार भीषण बाढ़ में एक मंदिर बह गया था और देवी की मूर्ति बहते हुए धारो गांव के पास एक चट्टान पर आकर रुक गई। ग्रामीणों ने वहां विलाप जैसी आवाज सुनी, जिसके बाद देवी ने स्वप्न में मूर्ति स्थापित करने का संकेत दिया। इसके बाद गांव वालों ने मिलकर उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया।

केदारनाथ से जुड़ी है मान्यता

इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता 2013 की केदारनाथ त्रासदी से भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि बाढ़ आने से ठीक पहले मंदिर को उसके मूल स्थान से हटाया गया था, जिसे स्थानीय लोग देवी की नाराजगी मानते हैं। बाद में फिर उसी स्थान पर मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया और देवी की प्रतिमा स्थापित की गई।

रक्षक देवी का स्थान

धारी देवी मंदिर को उत्तराखंड की रक्षक देवी का स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि चारधाम यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को मां धारी के दर्शन जरूर करने चाहिए, तभी यात्रा पूर्ण मानी जाती है। खास बात यह भी है कि यहां देवी की प्रतिमा का केवल ऊपरी भाग पूजनीय है, जबकि निचले हिस्से की पूजा रुद्रप्रयाग के कालीमठ में की जाती है।

नवरात्र के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना और भव्य आयोजन किए जाते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर के पास स्थित प्राचीन गुफा भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।

Sourcs – उत्तराखंड शासन

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