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कभी परम सुंदरी थी ताड़का, फिर बनी खूंखार राक्षसी, अगस्त्य ऋषि के एक श्राप ने बदल दी पूरी काया

कभी परम सुंदरी थी ताड़का, फिर बनी खूंखार राक्षसी, अगस्त्य ऋषि के एक श्राप ने बदल दी पूरी काया

धर्म डेस्क। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में भगवान श्री राम द्वारा किए गए सबसे पहले वध का प्रसंग आता है – राक्षसी ताड़का का वध। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि त्रेतायुग में आतंक का पर्याय बनी ताड़का जन्म से कोई राक्षसी नहीं थी, बल्कि वह बेहद खूबसूरत और बलशाली यक्षिणी थी।

एक पौराणिक घटना और महर्षि अगस्त्य के क्रोध के कारण वह एक सुंदर स्त्री से नरभक्षी और कुरूप राक्षसी बन गई थी। आइए जानते हैं रामायण के इस अनसुने रहस्य के बारे में।

ब्रह्मा जी के वरदान से हुआ था ताड़का का जन्म

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सुकेतु नाम के एक प्रतापी यक्ष राजा थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। सुकेतु की भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें एक अत्यंत सुंदर, रूपवान और हजार हाथियों के बल वाली पुत्री का वरदान दिया। राजा ने अपनी इस अलौकिक पुत्री का नाम ताड़का रखा।

बड़ी होने पर ताड़का का विवाह सुंद नाम के एक शक्तिशाली यक्ष से हुआ। विवाह के बाद ताड़का ने दो पुत्रों को जन्म दिया, जिनका नाम सुबाहु और मारीच (वही मारीच जो आगे चलकर रावण का दूत और स्वर्ण मृग बना) था।

पति की मौत के बदले की आग ने बदला ताड़का का भाग्य

ताड़का का पति सुंद बलवान होने के साथ-साथ अत्यंत क्रूर और राक्षस प्रवृत्ति का था। वह अक्सर ऋषि-मुनियों के धार्मिक अनुष्ठानों में विघ्न डालता था।

एक बार सुंद ने परम प्रतापी महर्षि अगस्त्य के आश्रम पर हमला कर भारी उत्पात मचाया। ऋषि अगस्त्य सुंद के इस दुस्साहस से अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने तपोबल से सुंद को वहीं भस्म कर दिया।

पति की मृत्यु की खबर सुनकर ताड़का क्रोध से पागल हो उठी। उसने अपने दोनों बेटों (सुबाहु और मारीच) के साथ मिलकर बदला लेने के लिए महर्षि अगस्त्य के आश्रम पर धावा बोल दिया। चूंकि सनातन धर्म में स्त्रियों पर शस्त्र उठाना वर्जित था, इसलिए ऋषि अगस्त्य ने ताड़का पर प्रहार नहीं किया, बल्कि क्रोध में आकर उसे श्राप दे दिया।

‘जिस सुंदरता और बल के घमंड में आकर तुमने एक ऋषि के आश्रम को नष्ट करने का प्रयास किया है, वह सुंदरता तुरंत समाप्त हो जाए। तुम आज से एक अत्यंत कुरूप, भयानक और इंसानों का मांस खाने वाली नरभक्षी राक्षसी बन जाओ।’

श्राप के प्रभाव से ताड़का की पूरी सुंदरता नष्ट हो गई और वह एक विशालकाय, डरावनी राक्षसी में बदल गई। उसके दोनों पुत्र भी राक्षस बन गए।

सरयू तट पर आतंक और श्री राम द्वारा वध

श्राप मिलने के बाद ताड़का, सुबाहु और मारीच के साथ सरयू नदी के किनारे सुंदर वन (जिसे बाद में ताड़का वन कहा जाने लगा) में रहने लगी। उसने पूरे क्षेत्र में हाहाकार मचा दिया और ऋषियों को मारकर खाना शुरू कर दिया।

जब महर्षि विश्वामित्र वहां अपना पवित्र यज्ञ कर रहे थे, तो ताड़का और उसके पुत्रों ने यज्ञवेदी पर रक्त और मांस बरसाकर उसमें बाधा डालना शुरू किया। राक्षसों के इस बढ़ते आतंक को समाप्त करने के लिए महर्षि विश्वामित्र अयोध्या के राजा दशरथ के पास पहुंचे और उनसे श्री राम तथा लक्ष्मण को अपने साथ वन ले जाने की अनुमति मांगी। इसके बाद, महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अपने अचूक बाण से ताड़का का वध कर वन को उसके आतंक से मुक्त कराया।

अस्वीकरण – इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। यह केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की गई है।

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