भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। इस यात्रा से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं और मान्यताएं हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
1. साल में सिर्फ एक बार मंदिर से बाहर आते हैं भगवान
रथ यात्रा ही वह अवसर होता है जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देते हैं। इसी दौरान लाखों श्रद्धालु बेहद करीब से भगवान के दर्शन कर पाते हैं।
2. हर साल नए रथ बनाए जाते हैं
पुरी की रथ यात्रा की सबसे खास बात यह है कि तीनों रथ हर साल नए बनाए जाते हैं। इनका निर्माण विशेष प्रकार की लकड़ी और सदियों पुरानी पारंपरिक तकनीकों से किया जाता है।
3. रथ बनाने में नहीं होती लोहे की कीलों का इस्तेमाल
रथों के कई हिस्से पारंपरिक लकड़ी की जोड़ाई तकनीक से तैयार किए जाते हैं। इसके निर्माण में आधुनिक तकनीकों के बजाय पारंपरिक शिल्पकला को प्राथमिकता दी जाती है।
4. भगवान जाते हैं गुंडिचा मंदिर
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। मान्यता है कि यह भगवान की मौसी का घर है। तीनों देवता यहां नौ दिन तक विश्राम करते हैं और फिर वापस श्रीमंदिर लौटते हैं।
5. सुना बेशा की खास परंपरा
वापसी के बाद भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन को सुना बेशा में सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। यह परंपरा भगवान की दिव्यता और जगत के स्वामी के रूप में उनकी महिमा का प्रतीक मानी जाती है।
6. पुरी के गजपति महाराजा लगाते हैं रथों में झाड़ू
रथ यात्रा के दौरान छेरा पहंरा नामक परंपरा निभाई जाती है। इसमें पुरी के गजपति महाराजा सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं। यह संदेश देती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं, चाहे राजा हो या आम व्यक्ति।
7. तीनों रथों की होती है अलग पहचान
भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष, बलभद्र के रथ का नाम तलध्वज और सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है। तीनों रथों का रंग, आकार और पहियों की संख्या भी अलग-अलग होती है।
8. स्नान यात्रा के बाद 15 दिन तक नहीं होते दर्शन
रथ यात्रा से पहले होने वाली स्नान यात्रा में भगवान का विशेष अभिषेक किया जाता है। इसके बाद मान्यता है कि भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इस वजह से लगभग 15 दिनों तक सार्वजनिक दर्शन नहीं देते। इस अवधि को अनसारा कहा जाता है।
9. लक्ष्मी जी रोकती हैं भगवान का रास्ता
रथ यात्रा से लौटते समय हेरा पंचमी की परंपरा निभाई जाती है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ जब बिना देवी लक्ष्मी को साथ लिए गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं, तो वापसी पर देवी लक्ष्मी प्रतीकात्मक रूप से नाराज होकर उनका रास्ता रोकती हैं। यह रस्म रथ यात्रा का बेहद आकर्षक हिस्सा मानी जाती है।







