धर्म डेस्क। कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला दीपावली का महापर्व धन, सुख-समृद्धि और आरोग्य का प्रतीक है। इस पावन अवसर पर माता लक्ष्मी, भगवान श्री गणेश और धनकुबेर की विधि-विधान से पूजा की जाती है। दीवाली की रात पूजन के पश्चात देश के कई हिस्सों में परिवार के सदस्य एक साथ बैठकर जुआ (द्यूत क्रीड़ा) खेलते हैं।
आम तौर पर, समाज में जुआ खेलने को एक बुराई और सामाजिक अभिशाप माना जाता है, परंतु दीवाली की रात शगुन के तौर पर इसे खेलने की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। पौराणिक कथाओं और शास्त्रों में इसके पीछे की रोचक कथाएं और नियम बताए गए हैं।
आइए जानते हैं दीवाली की रात जुआ खेलने की परंपरा की शुरुआत, धार्मिक कथाएं और किस प्रकार का खेल शुभ या अशुभ माना जाता है-
स्कंद पुराण की कथा: भगवान शिव और माता पार्वती का द्यूत क्रीड़ा प्रसंग
पौराणिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के अनुसार, दीवाली की पावन रात्रि को भगवान शिव और जगज्जननी माता पार्वती के बीच चौपड़ (जुआ) का खेल हुआ था। इस खेल में माता पार्वती ने भगवान शिव को परास्त कर दिया था। खेल में मिली जीत के आनंद और उल्लास में आकर माता पार्वती ने यह वरदान दिया कि जो भी मनुष्य दीवाली की रात्रि में शगुन के रूप में द्यूत क्रीड़ा (जुआ) खेलेगा, उस पर संपूर्ण वर्ष माता लक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहेगी और उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होगा।
इसके अलावा माना जाता है कि इस क्रीड़ा से भगवान शिव और माता पार्वती के मध्य प्रेम और आत्मीयता बढ़ी थी। इसी भाव के साथ दीपावली की रात परिवार के सदस्य आपस में खुशहाली के लिए यह परंपरा निभाते हैं।
किस तरह का जुआ खेलना होता है शुभ और कौन-सा अत्यंत अशुभ?
शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार, दीवाली पर जुआ खेलने की मर्यादाएं तय की गई हैं-
- शुभ जुआ (शगुन का खेल): दीवाली की रात केवल बिना पैसों के, शगुन और मनोरंजन के लिए परिवार के सदस्यों के साथ कौड़ियों, ताश या चौपड़ का खेल खेलना शुभ माना जाता है। इसका उद्देश्य केवल पारिवारिक आनंद, सौहार्द और परंपरा का निर्वहन करना है।
- अशुभ जुआ (पैसों की बाजी और सट्टा): पैसे लगाकर जुआ खेलना, सट्टा-मटका या लॉटरी में पैसा लगाना अत्यंत अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से धन की देवी माता लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं और व्यक्ति को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है।
महाभारत और ऋग्वेद में जुए के दुष्परिणामों की चेतावनी
सनातन शास्त्रों में पैसों के दांव वाले जुए को सर्वनाश की जड़ बताया गया है। महाभारत काल में जुए के व्यसन (द्यूत क्रीड़ा) के कारण ही पांडव अपना पूरा राज-पाट, धन-दौलत और यहां तक कि अपनी पत्नी द्रौपदी को भी हार बैठे थे, जिसका अंतिम परिणाम विनाशकारी महाभारत युद्ध के रूप में सामने आया।
भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के 10वें मंडल के अक्ष सूक्त में एक जुआरी का वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार, जुए की लत के कारण वह व्यक्ति कंगाल हो गया, समाज में उसकी साख खत्म हो गई और उसकी पत्नी भी उसे छोड़कर चली गई।







