धर्म डेस्क, नई दिल्ली। झारखंड का गुमला जिला प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ देवों की अनूठी महिमा को समेटे हुए है। जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर और रांची से 150 किलोमीटर दूर डुमरी ब्लॉक के बीहड़ जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित ‘टांगीनाथ धाम’ एक ऐसा ही अलौकिक और रहस्यमयी धार्मिक स्थल है।
मान्यता है कि इस पावन परिसर में साक्षात भगवान शिव का वास है। प्राचीन खंडहरों में तब्दील हो चुके इस मंदिर परिसर में आज भी खुले आसमान के नीचे 108 शिवलिंग और दुर्लभ कलाकृतियां बिखरी पड़ी हैं, जो भक्तों को त्रेतायुग के कालखंड में ले जाती हैं।
परशुराम के ‘परशु’ से पड़ा धाम का नाम
इस धाम का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व महर्षि परशुराम से जुड़ा है। स्थानीय भाषा में फरसे को ‘टांगी’ कहा जाता है, इसी कारण इस स्थल का नाम टांगीनाथ धाम प्रसिद्ध हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पिता जमदग्नि के आदेश पर मातृ-वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान परशुराम ने इसी स्थान पर घोर तपस्या की थी।
वहीं, एक अन्य मान्यता के अनुसार, सीता स्वयंवर में शिव धनुष टूटने पर क्रोधित हुए परशुराम को जब श्री राम के नारायण अवतार होने का ज्ञान हुआ, तो वे आत्मग्लानि से भर गए। पश्चाताप के लिए उन्होंने इसी पहाड़ी पर अपना परशु (फरसा) जमीन में गाड़ दिया और शिव आराधना में लीन हो गए।
विज्ञान के लिए अबूझ पहेली: जंग-मुक्त लोहा
टांगीनाथ धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहां जमीन में गड़ा हुआ लोहे का विशाल फरसा है, जिसकी ऊपरी आकृति त्रिशूल से मिलती-जुलती है। सदियों से धूप, छांव और भारी बरसात के बावजूद खुले आसमान के नीचे खड़े इस फरसे पर आज तक जंग की एक बूंद भी नहीं लगी है। यह फरसा जमीन से 5 फीट ऊपर दिखाई देता है, लेकिन यह जमीन के भीतर कितना गहरा है, यह आज भी एक रहस्य है।
(35).jpg)
वर्ष 1984 में पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में 15 फीट नीचे तक जाने के बाद भी इसका आखिरी सिरा नहीं मिल सका। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसे प्राचीन काल के उन्नत किस्म के लोहे का प्रमाण माना जाता है, जबकि श्रद्धालु इसे दैवीय चमत्कार मानते हैं।
अनूठी परंपराएं और मान्यताएं
टांगीनाथ धाम अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। इस मुख्य मंदिर में चंदन के पेड़ के अवशेष को ही शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि महादेव यहाँ के पुजारी से साक्षात बात करते थे, लेकिन किसी के द्वारा गोपनियता भंग किए जाने से क्रोधित होकर वे चंदन के पेड़ में अंतर्ध्यान हो गए।

इस मंदिर की एक और सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां देश के अन्य शिव मंदिरों की तरह संस्कृत में नहीं, बल्कि झारखंड की स्थानीय ‘नागपुरी भाषा’ में मंत्रोच्चार किया जाता है। यहां के मुख्य पुजारी स्थानीय आदिवासी समाज से ही होते हैं।
शनिदेव की कथा और वर्तमान स्थिति
धाम से जुड़ी एक लोककथा शनिदेव से भी संबंधित है। कहा जाता है कि शनिदेव के किसी अपराध पर क्रोधित होकर भगवान शिव ने उन पर त्रिशूल से प्रहार किया था, जो इस पहाड़ी पर आकर धंस गया।
वर्तमान में सड़क की दयनीय स्थिति और उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र होने के बावजूद, सावन मास और महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहाँ देश-विदेश से हजारों शिवभक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। रखरखाव के अभाव में प्राचीन मंदिर भले ही ढह चुका हो, लेकिन यहाँ की नक्काशियां और बिखरे प्राचीन शिवलिंग आज भी देवकाल की गवाही देते हैं।







