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ब्रज में होली की धूम… कब गूंजेगी लाठियों की आवाज और क्या है लट्ठमार होली का इतिहास?

ब्रज में होली की धूम… कब गूंजेगी लाठियों की आवाज और क्या है लट्ठमार होली का इतिहास?

फाल्गुन का महीना शुरू होते ही समूचे ब्रज क्षेत्र में होली का अद्भुत उल्लास छा जाता है। ब्रज की होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति का अनूठ …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 10 Feb 2026 06:09:59 PM (IST)Updated Date: Tue, 10 Feb 2026 06:09:59 PM (IST)

क्या है लट्ठमार होली का इतिहास?

HighLights

  1. 26 फरवरी को बरसाना की गलियों में खेली जाएगी लट्ठमार होली
  2. कृष्ण-राधा की प्रेममयी नोकझोंक से शुरू हुई यह अनूठी परंपरा
  3. ढाल और लाठियों के बीच गूंजेंगे पारंपरिक ब्रज के रसिया गीत

धर्म डेस्क। फाल्गुन का महीना शुरू होते ही समूचे ब्रज क्षेत्र में होली का अद्भुत उल्लास छा जाता है। ब्रज की होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति का अनूठा उत्सव है। यहां की लड्डू मार और लट्ठमार होली (Lathmar Holi 2026) पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस उत्सव की रौनक देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उमड़ते हैं।

ब्रज में यह उत्सव करीब 40 दिनों तक चलता है, जिसमें लट्ठमार होली का अपना एक विशेष महत्व है। आइए जानते हैं इस साल यह कब मनाई जाएगी और इसके पीछे की दिलचस्प कहानी क्या है।

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कब मनाई जाएगी लट्ठमार होली 2026?

वैदिक पंचांग के अनुसार, लट्ठमार होली फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर खेली जाती है। इस वर्ष यह भव्य उत्सव 26 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन बरसाना की गलियां लाठियों की थाप और लोकगीतों से गुंजायमान रहेंगी।

कैसे हुई इस अनोखी परंपरा की शुरुआत?

लट्ठमार होली की जड़ें द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की लीलाओं से जुड़ी हैं…

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  • पौराणिक कथा: मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं (ग्वाल-बालों) के साथ नंदगांव से राधा रानी के गांव बरसाना जाते थे। वहां वे राधा जी और उनकी सखियों के साथ ठिठोली करते और उन पर रंग डालते थे।
  • सीख और बचाव: नटखट कृष्ण और ग्वालों को सबक सिखाने के लिए राधा रानी और उनकी सखियां लाठियां लेकर उन्हें दौड़ाती थीं। ग्वाल-बाल खुद को बचाने के लिए ढालों का प्रयोग करते थे।

इसी प्रेममयी नोकझोंक ने कालांतर में एक परंपरा का रूप ले लिया, जिसे आज हम ‘लट्ठमार होली’ के नाम से जानते हैं।

लट्ठमार होली के खास नियम और परंपराएं

यह केवल लाठियां बरसाने का खेल नहीं, बल्कि एक सामाजिक और पारिवारिक मर्यादा का उत्सव है…

  • हुरियारे और सखियां: नंदगांव के पुरुषों को ‘हुरियारे’ कहा जाता है, जो सखा बनकर आते हैं। बरसाना की महिलाएं राधा की सखियां बनकर उन पर लाठियां बरसाती हैं।
  • सुरक्षा के साधन: पुरुष अपने सिर पर भारी पगड़ी बांधते हैं और बचाव के लिए चमड़े की मजबूत ढालों का उपयोग करते हैं।
  • घूंघट की मर्यादा: महिलाएं घूंघट की ओट में रहकर पुरुषों पर लाठी चलाती हैं।
  • रसिया गायन: इस दौरान गलियों में पारंपरिक ‘रसिया’ गीतों का गायन होता है, जो माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना देता है।

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