मंदिर से निकलते समय भगवान की तरफ पीठ न करने और उल्टे कदमों से चलने के पीछे आदर, सकारात्मक ऊर्जा को समेटने और अहंकार को मिटाने की मान्यताएं हैं।
By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Thu, 16 Jul 2026 02:12:54 PM (IST)Updated Date: Thu, 16 Jul 2026 02:20:46 PM (IST)
HighLights
- मंदिर के गर्भगृह से निकलते समय पीठ दिखाना अनादर माना जाता है
- उल्टे कदमों से बाहर आने पर गर्भगृह की सकारात्मक ऊर्जा कम होती है
- भगवान की ओर मुख करके पीछे हटने से इंसान का अहंकार कम होता है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली. अक्सर आपने देखा होगा कि मंदिर में भगवान के दर्शन करने के बाद लोग उल्टे कदमों से बाहर निकलते हैं। लोग अपनी पीठ भगवान की तरफ नहीं करते। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक, वैज्ञानिक और मानसिक मान्यताएं छिपी हैं। आइए जानते हैं इसके असल वजह..
1. भगवान के प्रति आदर और सम्मान
सनातन धर्म में भगवान को सृष्टि का सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जिस तरह हम अपने घर आए किसी बड़े-बुजुर्ग, गुरु या खास मेहमान के सामने से अचानक पीठ मोड़कर नहीं जाते, ठीक उसी तरह भगवान के सामने से भी पीठ दिखाकर हटना उनका अनादर माना जाता है। इसलिए जब तक हम गर्भगृह से बाहर नहीं आ जाते, हमारा मुख भगवान की तरफ ही रहता है।
2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) को समेटना
वैज्ञानिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर का गर्भगृह (जहां मूर्ति स्थापित होती है) ब्रह्मांडीय और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होता है। जब हम भगवान के सामने खड़े होते हैं, तो यह एनर्जी हमारे भीतर प्रवेश करती है। माना जाता है कि दर्शन के तुरंत बाद पीठ घुमा लेने से हम उस सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को रोक देते हैं। उल्टे कदमों से पीछे हटने का मतलब है कि हम आशीर्वाद और शांति को अपने भीतर समेटते हुए बाहर आ रहे हैं।
3. अहंकार को कम करना
भगवान के सामने सीधे पीठ मोड़कर चल देना अनजाने में इंसान के भीतर के घमंड या ‘काम निकल जाने के बाद चले जाने’ वाले भाव को दर्शाता है। इसके विपरीत, जब हम धीरे-धीरे उल्टे कदमों से पीछे हटते हैं, तो यह हमारी विनम्रता को प्रकट करता है। यह क्रिया हमें याद दिलाती है कि ईश्वर के सामने हमारा कोई अस्तित्व नहीं है और जो कुछ भी है, उन्हीं की कृपा है।
4. ध्यान को भटकने से बचाना
अक्सर जैसे ही हम मंदिर से बाहर जाने के लिए मुड़ते हैं, हमारा ध्यान तुरंत सांसारिक बातों, बाहर रखे जूतों-चप्पलों या शोर-शराबे पर चला जाता है। भगवान की तरफ मुंह रखकर पीछे हटने से हमारा ध्यान अंतिम क्षण तक ईश्वर की मूर्ति पर टिका रहता है। इससे मंदिर में मिली मानसिक शांति लंबे समय तक हमारे साथ बनी रहती है।







