धर्म डेस्क। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला ‘धनतेरस’ (धनत्रयोदशी) का पावन पर्व पांच दिवसीय दीपोत्सव का प्रथम दिन होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश के साथ भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था।
धनतेरस का दिन न केवल नई खरीदारी और आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि-कुबेर पूजन के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इस दिन संध्याकाल में ‘यम दीपम’ (यमराज के नाम का दीपक) जलाने का भी विशेष विधान है। संपूर्ण वर्ष में धनतेरस ही एकमात्र ऐसा दिन होता है, जब मृत्यु के देवता यमराज की विधिवत पूजा-अर्चना कर दीपदान किया जाता है।
आइए जानते हैं यम का दीपक जलाने का शुभ मुहूर्त, धार्मिक कारण, दिशा, मंत्र और सम्पूर्ण पूजन विधि-
यम दीपम 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
धनतेरस पर यम का दीपक हमेशा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में जलाया जाता है। यम दीपम जलाने का शुभ मुहूर्त: प्रदोष काल में सायं 05:38 बजे से सायं 06:55 बजे तक।
क्यों जलाया जाता है यमराज के नाम का दीपक?
पौराणिक मान्यताओं और पद्मपुराण के अनुसार, धनतेरस की रात यमराज के नाम का दीपदान करने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु (असमय मृत्यु) के भय और शारीरिक पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
पद्मपुराण का श्लोक– “कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां तु पावके। यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति॥”
अर्थ: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को जो व्यक्ति घर के बाहर यमराज के निमित्त दीपक प्रज्वलित करता है, उसकी अपमृत्यु (अकाल मृत्यु) का नाश हो जाता है।
यम दीपक जलाने की दिशा (दक्षिण दिशा का महत्व)
मान्यताओं के अनुसार, यमराज के नाम का दीपक हमेशा घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है। सनातन धर्म में दक्षिण दिशा को यमराज और पितरों की दिशा माना गया है। इस दिशा में यम का दीपक जलाने से यमराज प्रसन्न होते हैं और घर से नकारात्मक ऊर्जा और मृत्यु का भय समाप्त होता है।
यम दीपम जलाते समय का विशेष मंत्र
दीपक प्रज्वलित करते समय और उसे स्थापित करते समय इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करना चाहिए-
मंत्र-
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
यम-दीपदान की प्रामाणिक एवं सम्पूर्ण विधि
- चौमुखी दीपक की तैयारी: आटे का एक बड़ा दीपक बनाएं। उसमें रुई की दो लंबी बत्तियां इस प्रकार आड़ी-तिरछी रखें कि उनके चार मुख (चौमुखी दीया) बन जाएं।
- तेल और तिल भरना: इस चौमुखी दीपक में शुद्ध तिल का तेल भरें और साथ में थोड़े से काले तिल डाल दें।
- दीपक का पूजन: प्रदोष काल में इस दीपक को जलाएं और रोली, अक्षत (चावल) तथा पुष्प अर्पित कर यमराज का ध्यान करते हुए पूजन करें।
- अन्न की ढेरी बनाना: घर के मुख्य द्वार के बाहर (दक्षिण दिशा की ओर) थोड़े से खील या गेहूं की ढेरी बनाएं।
- दीपक की स्थापना: प्रज्वलित चौमुखी दीपक को खील/गेहूं की ढेरी के ऊपर इस प्रकार रखें कि उसकी लौ दक्षिण दिशा की ओर रहे।
- प्रणाम और प्रार्थना: दीपक स्थापित करने के बाद ‘ॐ यमदेवाय नमः’ कहते हुए दक्षिण दिशा की ओर हाथ जोड़कर प्रणाम करें और परिवार की सुरक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना करें।
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