गरुड़ पुराण के अनुसार सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करने से आत्मा के मोक्ष में बाधा आती है। अगले जन्म में शारीरिक दोष की आशंका रहती है। इसलिए सूर्योद…और पढ़ें
By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Fri, 07 Aug 2026 05:58:07 PM (IST)Updated Date: Fri, 07 Aug 2026 05:58:07 PM (IST)
HighLights
- गरुड़ पुराण और सनातन परंपरा के अनुसार सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करना वर्जित है
- कहा जाता है कि रात में अंतिम संस्कार करने से आत्मा को परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है
- सूर्य को आत्मा और मोक्ष का कारक माना गया है। सूर्यास्त के बाद स्वर्ग के द्वार बंद हो जाते
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। किसी भी प्रियजन की मृत्यु का क्षण अत्यंत दुखद होता है। सनातन परंपरा में गरुड़ पुराण के अनुसार जीवन और मृत्यु से जुड़े कई नियमों और रीति-रिवाजों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इन्हीं में से एक मुख्य नियम यह है कि सूर्यास्त के बाद किसी भी व्यक्ति का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु रात के समय होती है, तो उसके दाह संस्कार के लिए अगले दिन सूर्योदय तक का इंतजार किया जाता है।
आइए जानते हैं इसके पीछे के धार्मिक, आध्यात्मिक और पौराणिक कारण…
रात में अंतिम संस्कार न करने के धार्मिक-आध्यात्मिक कारण
- अगले जन्म में शारीरिक दोष की मान्यता: गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि रात के समय किसी का अंतिम संस्कार किया जाता है, तो मृत आत्मा को परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि रात में दाह संस्कार करने से जीवात्मा को अगले जन्म में किसी न किसी प्रकार की शारीरिक कमी या दोष का सामना करना पड़ सकता है।
रात में मृत्यु होने पर क्या करें? गरुड़ पुराण की सलाह
यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात के समय होती है, तो गरुड़ पुराण में कुछ विशेष नियमों का पालन करने का निर्देश दिया गया है-
- तुलसी के पास रखें पार्थिव देह: शव को घर के मुख्य हिस्से में रखने के बजाय तुलसी के पौधे के समीप रखें और पास में दीपक प्रज्वलित करें।
- शव को अकेला न छोड़ें: मृत शरीर को रात भर कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि इस समय नकारात्मक ऊर्जाएं सक्रिय रहती हैं।
- ईश्वर प्रार्थना व जाप: परिवार के किसी न किसी सदस्य को मृतक के पास बैठकर भगवान का नाम स्मरण और आत्मा की शांति के लिए निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए। इससे आत्मा को शांति मिलती है।
16 संस्कारों में अंतिम संस्कार का स्थान
सनातन परंपरा में वर्णित 16 संस्कारों में अंतिम संस्कार (दाह संस्कार) सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण माना गया है। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि मानव शरीर को पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) में पुनः विलीन करने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
शास्त्रों में कुछ विशेष परिस्थितियों में अपवाद भी बताए गए हैं। जैसे साधु-संतों को दाह संस्कार के स्थान पर समाधि दी जाती है, क्योंकि उनका शरीर साधना और तपस्या की विशेष ऊर्जा से युक्त माना जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार सही समय और पूरे विधि-विधान से किया गया अंतिम संस्कार ही आत्मा को बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।







