धर्म डेस्क। शनि देव को कर्म और न्याय का देवता माना जाता है। लोग शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या अन्य अशुभ प्रभावों से राहत पाने के लिए लोहे का छल्ला धारण करते हैं। हालांकि ज्योतिष शास्त्र और लाल किताब के अनुसार, बिना कुंडली का विश्लेषण किए लोहे का छल्ला पहनना लाभ की जगह हानि भी पहुंचा सकता है।
इन उपायों को अपनाते हैं लोग
शनि से जुड़े उपायों में नीलम, लोहे का छल्ला और घोड़े की नाल से बनी अंगूठी प्रमुख मानी जाती हैं। इनमें लोहे के छल्ले को सबसे ज्यादा लोग धारण करते हैं, लेकिन इसे पहनने के भी कुछ विशेष नियम बताए गए हैं।
लाल किताब के अनुसार क्या है नियम
लाल किताब के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य, शुक्र और बुध एक ही भाव में मौजूद हों, तो उसे लोहे का छल्ला पहनने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में चांदी का छल्ला अधिक शुभ माना जाता है। वहीं, यदि बुध बारहवें भाव में हो या राहु के साथ अशुभ प्रभाव दे रहा हो, तो लोहे का छल्ला हाथ में पहनने के बजाय चेन में डालकर गले में धारण करने की सलाह दी जाती है।
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, कुंडली में शनि यदि पहले से ही मजबूत स्थिति में होकर शुभ फल दे रहा हो, तो भी लोहे का छल्ला पहनना उचित नहीं माना जाता। ऐसे में यह उपाय अनावश्यक प्रभाव पैदा कर सकता है।
छल्ला पहनते समय क्या रखना चाहिए ध्यान
लोहे का छल्ला हमेशा दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली में पहनना चाहिए, क्योंकि इसी उंगली का संबंध शनि ग्रह से माना जाता है। शनिवार का दिन इसे धारण करने के लिए सबसे शुभ माना गया है। पुष्य, अनुराधा, रोहिणी और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में इसे पहनना विशेष फलदायी बताया गया है।
धार्मिक मान्यता यह भी है कि लोहे के छल्ले की नियमित रूप से सफाई और देखभाल करनी चाहिए। समय-समय पर इसे साफ रखने से इसकी ऊर्जा और प्रभाव बना रहता है।
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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। नईदुनिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं।







