इंटरनेट डेस्क। देश के शीर्ष न्यायालय ने आज कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना हर व्यक्ति, यहां तक कि बच्चों का भी मौलिक अधिकार है। उम्र देखकर प्रतिबंध नहीं लगा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस दौरान बोल दिया कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना बेतुका होगा। न्यायालय ने माना कि इंटरनेट पर गलत कंटेंट होने के कारण बच्चों के लिए इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाना सही नहीं है। इस प्रकार की रोक से बच्चे कम सुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं।
खबरों के अनुसार, न्यायायल ने केन्द्र सरकार को कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़े ऑनलाइन कंटेंट को पहचानने और हटाने की व्यवस्था मजबूत करने के लिए नेशनल डेटाबेस तैयार करने के निर्देश दिए हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को भी इस प्रकार के कंटेंट हटाने के दो घंटे के अंदर पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल को रिपोर्ट देनी होगी। आपको बात दें कि 5 साल में बच्चों की अश्लील सामग्री से जुड़े मामले 26.6 गुना बढ़ गए हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, बच्चों की अश्लील तस्वीरों और वीडियो से जुड़े मामले 2018 में 44 थे, जो 2022 में बढ़कर 1,171 हो गए।
PC: aajtak
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