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अमरनाथ का रहस्य… चरवाहे को मिले थे सोने के सिक्के, तब दुनिया के सामने आए बाबा बर्फानी!

अमरनाथ का रहस्य… चरवाहे को मिले थे सोने के सिक्के, तब दुनिया के सामने आए बाबा बर्फानी!

सनातन धर्म में अमरनाथ यात्रा का विशेष महत्व है। ‘बृंगेश संहिता’ और ‘नीलमत पुराण’ जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, बाबा बर्फानी के दर्शन का फल काशी से 1 …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 21 Apr 2026 04:32:11 PM (IST)Updated Date: Tue, 21 Apr 2026 04:32:11 PM (IST)

अमरनाथ का रहस्य

HighLights

  1. 15वीं सदी में चरवाहे बूटा मलिक ने दोबारा दुनिया को बताया गुफा का पता
  2. यहीं भगवान शिव ने पार्वती को सुनाया था सृष्टि और अमरता का रहस्य
  3. बृंगेश संहिता के अनुसार, दर्शन मात्र से मिलता है काशी से 10 गुना पुण्य

धर्म डेस्क। सनातन धर्म में अमरनाथ यात्रा का विशेष महत्व है। ‘बृंगेश संहिता’ और ‘नीलमत पुराण’ जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, बाबा बर्फानी के दर्शन का फल काशी से 10 गुना और प्रयाग से 100 गुना अधिक पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि इसी गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरता का रहस्य (अमर कथा) सुनाया था।

सर्वप्रथम दर्शन का सौभाग्य: पौराणिक मत

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अमरनाथ गुफा के सबसे पहले दर्शन को लेकर दो अलग-अलग कालखंडों की कथाएं मिलती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में कश्मीर घाटी एक विशाल झील थी। जब ऋषि कश्यप ने इस घाटी से जल को बाहर निकाला, तब हिमालय की यात्रा पर निकले ऋषि भृगु ने सबसे पहले इस पवित्र गुफा और बर्फानी शिवलिंग के दर्शन किए थे। इस प्रकार शास्त्रीय आधार पर ऋषि भृगु को ही इस शिवलिंग का प्रथम दृष्टा माना जाता है।

15वीं शताब्दी की लोककथा, बूटा मलिक का वृत्तांत

मध्यकाल में इस गुफा के दोबारा प्रकाश में आने का श्रेय बूटा मलिक नामक एक चरवाहे को दिया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार एक बार बूटा मलिक को जंगल में एक साधु मिले, जिन्होंने उसे कोयले से भरा एक थैला दिया। जब वह घर पहुंचा तो कोयला सोने के सिक्कों में बदल चुका था। कृतज्ञता व्यक्त करने जब वह वापस उस स्थान पर गया, तो वहां साधु की जगह उसे एक विशाल गुफा मिली, जिसमें बर्फ का दूधिया शिवलिंग चमक रहा था। इसके बाद से ही यह स्थान आम जनमानस के लिए प्रमुख तीर्थस्थल बन गया।

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इतिहास और राजतरंगिणी के प्रमाण

अमरनाथ की यात्रा केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पुख्ता ऐतिहासिक साक्ष्य भी मिलते हैं। कल्हण द्वारा रचित 12वीं शताब्दी के ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ में अमरेश्वर (अमरनाथ) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। 11वीं शताब्दी में कश्मीर की रानी सूर्यमती ने अमरनाथ मंदिर को त्रिशूल, बानलिंग और अन्य पवित्र वस्तुएं भेंट की थीं, जो इस तीर्थ की प्राचीनता को प्रमाणित करता है।

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