धर्म डेस्क, मध्यप्रदेश। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित मां तारादेवी पीठ शक्ति उपासना, तांत्रिक साधना और आध्यात्मिक साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। बिरला नगर (न्यू रेशम कॉलोनी) में स्थित यह प्राचीन पीठ दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या मां तारा को समर्पित है। खासकर गुप्त नवरात्र के दौरान यहां देशभर से साधक और श्रद्धालु साधना, मंत्र जाप और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
1992 में हुई थी मां तारादेवी की प्राण प्रतिष्ठा
मां पीतांबरा पीठ, दतिया के ब्रह्मलीन पीठाधीश्वर के परम शिष्य पंडित रमेश उपाध्याय ने अपने गुरु के निर्देश पर वर्ष 1992 में यहां मां तारादेवी की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। तभी से यह पीठ तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों से साधक यहां एकांत में ध्यान, मंत्र जाप और विशेष अनुष्ठान करने आते हैं।
गुप्त नवरात्र में बढ़ जाता है पीठ का महत्व
आषाढ़ और माघ मास में आने वाले गुप्त नवरात्र को देवी साधना और तांत्रिक उपासना के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार वर्ष में चार नवरात्र होते हैं। इनमें चैत्र और शारदीय नवरात्र सार्वजनिक रूप से मनाए जाते हैं, जबकि आषाढ़ और माघ के नवरात्र गुप्त नवरात्र कहलाते हैं।
इन नौ दिनों में दस महाविद्याओं की साधना, मंत्र सिद्धि, जप, हवन और विशेष अनुष्ठानों का विधान बताया गया है। इसी कारण गुप्त नवरात्र के दौरान मां तारादेवी पीठ में साधकों की संख्या काफी बढ़ जाती है।
मंदिर में होते हैं विशेष धार्मिक अनुष्ठान
गुप्त नवरात्र के दौरान मंदिर में शतचंडी पाठ, नवचंडी पाठ, घटस्थापना, विशेष यज्ञ और तांत्रिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
सुबह से देर रात तक वैदिक मंत्रों की ध्वनि और साधकों के मंत्र जाप से पूरा परिसर भक्तिमय और आध्यात्मिक वातावरण में डूबा रहता है। श्रद्धालु यहां मां तारा से ज्ञान, शांति और सकारात्मक ऊर्जा की कामना करते हैं।
मंदिर में क्या-क्या है खास?
ग्वालियर रेलवे स्टेशन से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित इस पीठ में प्रवेश करते ही यज्ञपीठ और शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है। गर्भगृह में मां तारादेवी, उच्छिष्ट गणेश और मां त्रिपुरा सुंदरी की प्रतिमाएं विराजमान हैं। यहां स्थापित सिद्ध श्रीयंत्र भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। मान्यता है कि यह श्रीयंत्र दतिया स्थित पीतांबरा पीठ के आशीर्वाद स्वरूप यहां स्थापित किया गया था। मंदिर परिसर के पीछे पंडित रमेश उपाध्याय की समाधि और साधकों के लिए बने ध्यान कक्ष आज भी साधना की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
मां तारा को क्यों कहा जाता है मोक्षदायिनी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ‘तारा’ का अर्थ है जीव को भवसागर से पार लगाने वाली। इसी वजह से मां तारा को मोक्षदायिनी और करुणामयी शक्ति के रूप में पूजा जाता है।
तांत्रिक परंपरा में मां तारा की साधना को अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। साधकों का मानना है कि सच्ची श्रद्धा, अनुशासन और मंत्र साधना से आत्मबल, विवेक और आध्यात्मिक जागरण की प्राप्ति होती है।
कई प्रमुख हस्तियां भी कर चुकी हैं दर्शन
मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती सहित कई राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तियां समय-समय पर यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंच चुकी हैं। पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा को भी इस पीठ का नियमित साधक माना जाता है।
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