धीरज बाजपेई, धर्म डेस्क नईदुनिया जबलपुर। जनेऊ, जिसे संस्कृत में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है, एक पवित्र धागा है जो बाएं कंधे से दाएं बाजू की ओर लपेटा जाता है। जनेऊ यानी यज्ञोपवीत हिंदू धर्म में पहना जाने वाला एक पवित्र सूती धागा है। इसे उपनयन संस्कार के दौरान बाएं कंधे से लेकर दाईं भुजा के नीचे पहना जाता है। यह व्यक्ति के आध्यात्मिक संकल्प, सात्विकता और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है।
गायत्री मंत्र के तीन चरणों का भी प्रतीक हैं
यह तीन धागों वाला होता है, जो देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण का प्रतीक है। तीन सूत्र सत्व, रज और तम का प्रतिनिधित्व करते हैं और गायत्री मंत्र के तीन चरणों का भी प्रतीक हैं। जनेऊ को गले में इस प्रकार डाला जाता है कि यह बाएं कंधे के ऊपर रहे।
यज्ञोपवीत में पांच गांठ होती हैं
यज्ञोपवीत में कुल नौ तार होते हैं, जो एक-एक तार में तीन-तीन तारों के रूप में होते हैं। ये तार मुख, नासिका, आंख, कान, मल और मूत्र के द्वारा मिलकर बनते हैं। यज्ञोपवीत में पांच गांठ होती हैं, जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक हैं। यह पांच यज्ञों, ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतिनिधित्व करता है।
जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है
वैदिक धर्म में प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है कि वह जनेऊ पहनें और इसके नियमों का पालन करें। जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है, जिसका अर्थ है कि इसे धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं का अध्ययन करना चाहिए। इनमें वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, आभूषण निर्माण और कृषि ज्ञान शामिल हैं।
जनेऊ के कुछ महत्वपूर्ण नियम
- यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन से पहले दाएं कान पर चढ़ाएं और हाथ स्वच्छ करके ही उतारें।
- यदि यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या छह माह से अधिक समय हो जाए, तो इसे बदल देना चाहिए।
- यज्ञोपवीत को शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता; इसे कण्ठ में पहने रहकर ही साफ किया जाता है।
- मर्यादा बनाए रखने के लिए इसमें चाबी के गुच्छे आदि नहीं बांधने चाहिए।
- बालक को तब तक यज्ञोपवीत नहीं पहनाना चाहिए जब तक वह नियमों का पालन करने योग्य न हो।
जनेऊ को त्यागने का मंत्र यह है
यज्ञोपवीतं पुराणं जरजरं कश्यपोद्भवम्। त्यजामि ब्रह्मनिर्मितं नित्यं सात्त्वगुणात्मकम्॥ अर्थ: मैं इस पुराने और जर्जर यज्ञोपवीत को त्याग करता हूँ। ऐसा कहकर पुराना जनेऊ उतार दें और नया धारण्र कर दें।
शरीर पर धारण नहीं किया जाता है खंडित यज्ञोपवीत
पूर्णिमा के दिन इसे बदल लेना चाहिए। खंडित यज्ञोपवीत को शरीर पर धारण नहीं किया जाता है। इस बात का ध्यान रखें कि इसके धागे गंदे न होने पाएं, गंदे होने पर भी इसे बदलना चाहिए।
चिकित्सा विज्ञान में क्या भूमिका है जनेऊ की
दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जनेऊ धारण करने से बुरे स्वप्नों से मुक्ति मिलती है और यह पेट संबंधी रोगों एवं रक्तचाप की समस्याओं से भी बचाव करता है।
जनेऊ की सही उम्र है
ब्राह्मण का 8 वर्ष की आयु में जनेऊ संस्कार हो जाना चाहिए, क्षत्रिय का 11 वर्ष की आयु में जनेऊ संस्कार हो जाना चाहिए, और वैश्य का 15 वर्ष की आयु में जनेऊ संस्कार हो जाना चाहिए।
विवाह के लिए अनिवार्य शर्त
कई प्राचीन सनातन परंपराओं के अनुसार, एक पुरुष का विवाह तभी पूर्ण माना जाता है जब वह जनेऊ संस्कार (यज्ञोपवीत) संपन्न कर चुका हो।
शादी से ठीक पहले जनेऊ
यदि किसी बालक का जनेऊ बचपन में नहीं हुआ है, तो अक्सर उत्तर भारत और अन्य पारंपरिक परिवारों में विवाह की रस्मों (मंडप) से ठीक एक दिन पहले उसका जनेऊ संस्कार किया जाता है।
जनेऊ के धागों का महत्व
जनेऊ में 3 धागे होते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। विवाह के बाद विवाहित पुरुष को छह , 3 धागे स्वयं के और 3 धागे पत्नी के उत्तरदायित्व के प्रतीक माने जाते हैं।
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