सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर में इन दिनों एक अलग ही हलचल है। नर्मदा तट की सुबह की आरती हो, गौरीघाट की सीढ़ियां हों या पुराने शहर की गलियां, हर ओर विवाह और मांगलिक आयोजनों की तैयारियों की आहट सुनाई दे रही है।
घर-आंगनों में रिश्तेदारों के आने-जाने की चर्चाएं शुरू
कपड़ों की दुकानों में भीड़ है, आभूषणों के शोरूम सजे हैं, मैरिज गार्डन बुक हो चुके हैं और घर-आंगनों में रिश्तेदारों के आने-जाने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कारण केवल इतना है कि देवशयनी एकादशी अब दूर नहीं।
सनातन परंपरा में आषाढ़ शुक्ल एकादशी का विशेष महत्व है
मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और यहीं से चातुर्मास का आरंभ होता है। इसके बाद चार महीने तक विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत और अन्य मांगलिक संस्कार स्थगित हो जाते हैं। यही वजह है कि देवशयनी एकादशी से पहले का समय शुभ कार्यों के लिए अंतिम अवसर माना जाता है।
25 जुलाई को देवशयनी एकादशी
25 जुलाई को देवशयनी एकादशी आएगी और शहनाइयां कुछ समय के लिए शांत होंगी, तब यह विराम किसी रिक्तता का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक तैयारी का होगा।
फिर देवप्रबोधिनी एकादशी पर जब भगवान विष्णु जागेंगे
नर्मदा की अविरल धारा की तरह जीवन भी अपनी गति से आगे बढ़ता रहेगा, कभी मंगल गीतों के साथ, कभी मंत्रोच्चार के साथ। और फिर देवप्रबोधिनी एकादशी पर जब भगवान विष्णु जागेंगे, तब संस्कारधानी में एक बार फिर विवाह मंडप सजेंगे, शहनाइयां गूंजेंगी और नर्मदा तट नए मंगल गीतों का साक्षी बनेगा।
चातुर्मास शुरू होते ही वातावरण का स्वर बदल जाता है
नर्मदा तट की संस्कृति में भी इस परिवर्तन को सहजता से महसूस किया जा सकता है। वर्ष भर जहां शहनाइयों, बारातों और मंगल गीतों की ध्वनि सुनाई देती है, वहीं चातुर्मास शुरू होते ही वातावरण का स्वर बदल जाता है। उत्सव की जगह उपासना ले लेती है। विवाह मंडपों की चहल-पहल धीरे-धीरे कथा पंडालों, सत्संग सभाओं और धार्मिक आयोजनों में परिवर्तित हो जाती है।
अभी शुभ कार्यों के लिए सीमित मुहूर्त उपलब्ध
धर्माचार्य बताते हैं कि इस बार देवशयनी एकादशी से पहले विवाह और अन्य शुभ कार्यों के लिए सीमित मुहूर्त उपलब्ध हैं। यही कारण है कि परिवार तेजी से तैयारियां पूरी करने में जुटे हैं। संस्कारधानी के बाजारों में इन दिनों जो रौनक दिखाई दे रही है, वह केवल व्यापारिक गतिविधि नहीं बल्कि भारतीय पारिवारिक परंपराओं की जीवंतता का भी प्रमाण है। यहां विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और कई पीढ़ियों के भावनात्मक मिलन का उत्सव होता है।
आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक जागरण का पर्व है चातुर्मास
दिलचस्प बात यह है कि सनातन संस्कृति में चातुर्मास को केवल निषेध का काल नहीं माना गया। यह आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक जागरण का पर्व भी है। जब प्रकृति वर्षा ऋतु में प्रवेश करती है, तब मनुष्य को भी अपने भीतर झांकने का अवसर दिया जाता है। संत-महात्मा एक स्थान पर निवास करते हैं, भागवत कथा, रामायण पाठ, सत्संग और धर्मोपदेश का क्रम आरंभ होता है। मानो समाज को कुछ समय के लिए बाहरी उत्सवों से हटाकर आंतरिक यात्रा की ओर मोड़ दिया जाता है।
जब नवदंपती आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं
नर्मदा तट पर यह परिवर्तन और भी सुंदर दिखाई देता है। जिन घाटों पर विवाह के बाद नवदंपती आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं, वहीं कुछ दिनों बाद साधक जप-माला लेकर बैठ जाते हैं। आरती की लौ तो वही रहती है, लेकिन उसके अर्थ बदल जाते हैं। एक ओर गृहस्थ जीवन के नए अध्याय का मंगलाचार होता है, दूसरी ओर वैराग्य और साधना की अनुभूति।
उत्सव नहीं बल्कि मूल्य भी सिखाती सनातन परंपरा
आषाढ़ मास में गुप्त नवरात्र और गुरुपूर्णिमा जैसे पर्व भी इसी आध्यात्मिक वातावरण को और गहरा करते हैं। गुरुपूर्णिमा पर गुरु-शिष्य परंपरा का सम्मान, आश्रमों में पूजन और ज्ञान की परंपरा का स्मरण भारतीय संस्कृति की उस धारा को जीवित रखता है, जो केवल उत्सव नहीं बल्कि मूल्य भी सिखाती है।
सनातन जीवन-दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता
शायद यही सनातन जीवन-दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है। यहां जीवन केवल निरंतर उत्सव नहीं है और न ही केवल तपस्या। दोनों के बीच संतुलन है। कुछ समय विवाह की शहनाइयों के लिए है, तो कुछ समय मन की वीणा को सुनने के लिए। कुछ दिन परिवार और समाज के उत्सवों के लिए हैं, तो कुछ दिन ईश्वर और आत्मा के संवाद के लिए।
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