अनूप श्रीवास्तव, जगदलपुर। बस्तर की धरती अपनी अनूठी जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और देवी-देवताओं के प्रति अटूट आस्था के लिए देशभर में विशिष्ट पहचान रखती है। यहां देवी आराधना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है।
इसी आस्था का एक अनूठा केंद्र है जगदलपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर बस्तर विकासखंड के गिरोला गांव में स्थित मां हिंगलाजिन माता का मंदिर।
बस्तर की कुलदेवी के रूप में पूजी जाने वाली मां हिंगलाजिन के दरबार में छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा और तेलंगाना से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
इस मंदिर की सबसे खास परंपरा यह है कि यहां मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के साथ दिवंगत पूर्व पुजारियों की प्रतिमाओं की भी नियमित रूप से पूजा की जाती है।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं और मनोकामना दीप प्रज्वलित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
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पूर्व पुजारियों की प्रतिमाओं की भी होती है पूजा
- गिरोला स्थित मां हिंगलाजिन मंदिर की परंपराएं इसे दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं।
- मंदिर के पुजारी लोकनाथ कश्यप के अनुसार, यहां जिन पुजारियों का निधन हो चुका है, उनकी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।
- नवरात्रि सहित अन्य दिनों में भी इन प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना की जाती है।
- यह परंपरा मंदिर की धार्मिक मान्यताओं के साथ पीढ़ियों से पूजा-पाठ की जिम्मेदारी निभाने वाले पुजारियों के प्रति सम्मान को भी दर्शाती है।
- प्रधान पुजारी लोकनाथ कश्यप बताते हैं कि राजा-महाराजाओं के समय से स्थापित इस मंदिर में उनका परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा-अर्चना करता आ रहा है।
- मां हिंगलाजिन को मां दंतेश्वरी का स्वरूप और बस्तर की कुलदेवी माना जाता है।
मनोकामना पूरी होने पर चढ़ाते हैं चांदी के छत्र
- मंदिर की गर्भगृह में स्थापित मां हिंगलाजिन के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
- मान्यता है कि भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के दरबार में आते हैं।
- मनोकामना पूरी होने पर चांदी के छोटे-बड़े छत्र अर्पित करते हैं।
- इन छत्रों को माता के सिंहासन की छतरी भी कहा जाता है।
- इसी मान्यता के चलते मंदिर के गर्भगृह में चांदी के छत्रों का बड़ा संग्रह दिखाई देता है।
- मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।
- नवरात्रि के दिनों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है।
- भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार ज्योत प्रज्वलित कर माता से परिवार की सुख-शांति, खुशहाली और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

पूर्व पुजारी की प्रतिमाएं
मोरिया बाजा की धुन से गूंजता है माता का दरबार
मां हिंगलाजिन मंदिर की धार्मिक पहचान में बस्तर का पारंपरिक मोरिया बाजा भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि माता की आराधना के दौरान मोरिया बाजा बजाने से देवी प्रसन्न होती हैं। इसी कारण पूजा-अर्चना और आरती के दौरान इस पारंपरिक वाद्य का उपयोग किया जाता है। मोरिया बाजा की धुन मंदिर के धार्मिक वातावरण को बस्तर की लोकसंस्कृति से जोड़ती है।
नवरात्रि में प्रज्वलित हुईं 770 ज्योत
नवरात्रि के अवसर पर मां हिंगलाजिन मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर ज्योत प्रज्वलित करते हैं। मंदिर के पुजारी लोकनाथ कश्यप के अनुसार, इस बार नवरात्रि में तेल की 645 और घी की 125 ज्योत प्रज्वलित की गईं। इस तरह कुल 770 ज्योत के माध्यम से भक्तों ने माता के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। वर्ष 2016 में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। इसके बाद से यहां श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।







