धर्म डेस्क। हिंदू धर्म में महाभारत केवल एक ग्रंथ या महाकाव्य ही नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का खजाना भी है। आज भी कई लोग ऐसे हैं जो नियमित रूप से महाभारत पढ़ते हैं।
इसके पात्रों के साथ स्वयं को जोड़ते हैं और महाभारत की घटनाओं, प्रसंगों को स्वयं के जीवन में घटित होते देखते हैं। अगर आप खुद को कहानी में शामिल करते हैं, तो आप खुद को कई रोल निभाते हुए देख सकते हैं।
क्या आप दुर्योधन हैं, क्या आप भीम हैं, क्या आप युधिष्ठर हैं? महाभारत मनोरंजन के लिए नहीं है।
आप दूसरों की ज़िंदगी में जो कुछ भी झेला है, उसे जीने की प्रक्रिया में कई चीज़ों से आगे बढ़ सकते हैं। आइये समझते हैं महाभारत की कौन सी बातें हैं जो जीवन से मेल खाती हैं।
महाभारत की छोटी कहानियां और पात्र
1. कर्ण – एक महान योद्धा जो अधर्मी का साथ देने से बुरा बन गया
कर्ण महाकाव्य के सबसे लोकप्रिय लेकिन दुखद हीरो में से एक हैं। कर्ण के अच्छे और इज्ज़तदार किरदार के बावजूद, कौरवों की तरफ़ किस बात ने उसे बांधे रखा? कर्ण महाभारत ग्रंथ का एक महान योद्धा था, लेकिन इसके बाद भी उसे एक बुरे अंत का सामना करना पड़ा। जिसका कारण था कि उनसे दुर्योधन जैसे अधर्मी का साथ दिया। ऐसे में हमें इससे यह सीख लेनी चाहिए कि भले ही आपका मित्र कितनी ही मददगार क्यों न हो, लेकिन अगर वह आपको बुरी संगत की ओर ले जा रहा है, तो ऐसे में उसका साथ छोड़ने में ही भलाई है।
2. दुर्योधन की बड़ी गलती
यह एक ऐसी सिचुएशन के बारे में है जब दुर्योधन और अर्जुन दोनों ने कृष्ण से अपना साथी बनने के लिए कहा, क्योंकि वे कुरुक्षेत्र में लड़ाई से पहले बड़ी सेना बना रहे थे। दुर्योधन के रवैये और पसंद की उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी, हालांकि उसे अपनी मूर्खता का तुरंत एहसास नहीं हुआ।
3. जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं
कृष्ण के दुर्योधन को धर्म और अधर्म समझाने के प्रसंग को देखा जाए तो पता चलता है कि ज़िंदगी में कुछ भी काला और सफ़ेद नहीं होता। हमें हर परिस्थिति को समभाव से देखना चाहिये। अच्छा समय हो या बुरा समय, वह बीत ही जाता है। ऐसे में सफलता पर ना तो दंभ करना चाहिये और असफलता पर निराश नहीं होना चाहिये।
4. कुरुक्षेत्र में भी धोखा
कृष्ण की सबसे कन्फ्यूज़ करने वाली बातों में से एक है लड़ाई के दौरान उनका छल करना। हम लड़ाई की कुछ साफ़-साफ़ बताई गई घटनाओं के ज़रिए इन कामों के पीछे की वजह को देखते हैं। ऐसे में इससे हमें यह सीख लेनी चाहिए कि हमें ईर्ष्या व अहंकार जैसे भावों का त्याग कर देना चाहिए, अन्यथा यह हमारे लिए मुसीबत बन सकते हैं।
5. महत्वाकांक्षाएं
कौरवों की महत्वाकांक्षाएं बहुत ज्यादा बढ़ गई थीं। दुर्योधन से ईर्ष्या और अहंकार के चलते अकेले ही हस्तिनापुर का सारा राजपाट हड़प लेना चाहता था। उनसे पांडवों को पांच गांव देने से भी मना कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि भीषण युद्ध में हजारों सैनिकों और योद्धाओं ने अपनी जान गवाई।
6. अन्याय के समय मौन ना रहें
द्रौपदी का चीरहरण होने पर भी सभा में मौजूद बड़े-बड़े विद्वान और महान योद्धा चुपा साधे रहे, जिसका परिणाम एक भीषण युद्ध था। ऐसे में हमें इस घटना से यह सीख मिलती है, कि जहां अन्याय हो रहा हो, वहां कभी मौन नहीं रहना चाहिए। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के साथ ही हमें महिलाओं का सम्मान करने की भी सीख लेनी चाहिए।
7. पांडवों की अंतत: जीत
महाभारत ग्रंथ से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि मुश्किल वक्त आने पर भी हमें अपनों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। जिस प्रकार पांडवों ने वनवास और अज्ञातवास के समय भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा और युद्ध में भी एक-दूसरे का सहारा बने। पांडवों की एकता ने ही युद्ध में उनकी जीत में बड़ी भूमिका निभाई।







