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‘माई’ और ‘हार’ से क्या है मैहर का कनेक्शन?, इस पावन भूमि की एक और है खास पहचान

‘माई’ और ‘हार’ से क्या है मैहर का कनेक्शन?, इस पावन भूमि की एक और है खास पहचान

मनोज दुबे। मैहर में स्थित माता शारदा देवी मंदिर देश भर में लोगों की आस्था का केंद्र है। यहां आम दिनों में तो श्रद्धालुओं की भीड़ रहती ही है, नवरात्र के मौके पर श्रद्धालुओं का आंकड़ा काफी बढ़ जाता है। चैत्र नवरात्र में भी यह क्रम जारी है।

मंदिर प्रबंधन समिति के अनुसार अब तक यहां पांच लाख से अधिक श्रद्धालु मां शारदा का दर्शन कर चुके हैं। चैत्र नवरात्र की पंचमी पर मंगला आरती के साथ माता के दर्शन का क्रम प्रारंभ हुआ, जो सतत जारी है। नवरात्र के प्रथम दिन से ही मैहर दरबार में श्रद्धालुओं का बड़ी सख्या में आना जारी है। चैत्र नवरात्र के प्रथम पांच दिनों में दर्शनाथिर्यों का आंकड़ा साढ़े पांच लाख को पार कर चुका है।

क्या है मैहर से जुड़ी मां की कहानी

धर्म ग्रंथों के अनुसार, कहा जाता है कि एक दिन भगवान शिव अपनी प्रिय पत्नी देवी सती के पार्थिव शरीर को लेकर शोक में भटक रहे थे। उनका दुःख इतना गहरा था कि पूरा ब्रह्मांड भी मानो मौन हो गया था। तभी देवी सती का एक हार धरती पर गिरा और वह स्थान था मैहर।

‘माई’ और ‘हार’ से मिलकर नाम पड़ा मैहर

कहा जाता है कि समय बीतता गया, लेकिन उस पवित्र घटना की स्मृति लोगों के दिलों में बस गई। ‘माई’ यानी मां और ‘हार’ से मिलकर उस स्थान का नाम मैहर पड़ा। धीरे-धीरे यह स्थान आस्था का केंद्र बन गया और माना जाने लगा कि यहां देवी शक्ति स्वयं विराजमान हैं।

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मंदिर लगभग 502 ईस्वी से भक्तों की आस्था का केंद्र

मैहर की त्रिकूटा पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर मां शारदा का मंदिर स्थापित हुआ। कहते हैं, यह मंदिर लगभग 502 ईस्वी से भक्तों की आस्था का केंद्र है। पहाड़ी पर चढ़ने के लिए 1063 सीढ़ियां हैं। हर सीढ़ी मानो भक्त की श्रद्धा और विश्वास की परीक्षा लेती है, लेकिन मां के दर्शन की चाह हर कठिनाई को आसान बना देती है। आज के समय में रोपवे की सुविधा भी है, जिससे हर कोई आसानी से मां के दरबार तक पहुंच सकता है।

इस पावन भूमि की एक और खास पहचान है

इस पावन भूमि की एक और खास पहचान है संगीत। यहीं जन्म हुआ महान संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खान का, जिन्होंने मैहर-सेनिया घराने की स्थापना की। उनके सुरों की गूंज आज भी इस धरती की हवा में महसूस होती है। उनके शिष्यों, जैसे पंडित रवि शंकर और उस्ताद अली अकबर खान, ने इस परंपरा को पूरी दुनिया तक पहुंचाया।

मंदिर आस्था, ज्ञान और शांति का प्रतीक

मां शारदा का यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि आस्था, ज्ञान और शांति का प्रतीक है। दूर-दूर से लोग यहां अपने दुख, चिंता और इच्छाएं लेकर आते हैं। कहा जाता है कि जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में आता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता।

नवरात्रि के दिनों में यह स्थान और भी जीवंत हो उठता है। पूरे दस दिनों तक भक्ति, पूजा और उत्सव का माहौल रहता है। मां शारदा विभिन्न रूपों में सजी-धजी दिखाई देती हैं और भक्त उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं।

मां शारदाम्बा की प्रतिमा पांच धातुओं से बनी है

मंदिर में स्थापित मां शारदाम्बा की प्रतिमा पांच धातुओं से बनी है। उनके हाथों में ज्ञान और करुणा का प्रतीक दिखाई देता है। भक्तों का मानना है कि उनके दर्शन मात्र से ही मन को शांति और बुद्धि को प्रकाश मिलता है।

मैहर केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत कहानी है। आस्था की, इतिहास की और उस अटूट विश्वास की, जो सदियों से लोगों के दिलों में बसता आया है।

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मेवों से हुआ माता राजराजेश्वरी का शृंगार

वहीं, नरसिंहपुर जिले के गोटेगांव स्थित झोतेश्वर धाम में माता राजराजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी विराजमान हैं। चैत्र नवरात्र में मां के दिव्य शृंगार का क्रम जारी है। चैत्र नवरात्र के पांचवें दिन माता त्रिपुर सुंदरी का स्कंदमाता के रूप में पूजन-अर्चन किया गया।

इस दिन मातारानी का काजू, किशमिश, बादाम, मखाना जैसे मेवों से अद्भुत शृंगार किया गया। इसे देखने और आदिशक्ति का आशीष लेने यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है।

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