मनोज दुबे, धर्म डेस्क, इंदौर। हिमालय की चोटी पर श्वेत बर्फ के बीच एक योगी समाधि में लीन थे। न कोई इच्छा, न कोई अभाव। न धन की चाह, न सत्ता का आकर्षण। वे पूर्ण थे, निर्विकार और निर्व्याज थे…क्योंकि वो देवों के देव महादेव शिव थे।
शिव.. जब एक वैरागी थे, तो आखिर गृहस्थ क्यों बन गए? उन्होंने शादी क्यों की? वह कैलाश से नीचे क्यों आए? आखिर शिव को (अनिच्छा से) अपनी संतान की रचना क्यों करनी पड़ी ? दरअसल, भगवान शिव के विवाह के पीछे कोई एक कारण नहीं था, बल्कि उनके विवाह के पीछे गहरे आध्यात्मिक, ब्रह्मांडीय और पौराणिक कारण थे। उनके विवाह का मुख्य उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सुख नहीं, बल्कि संसार में संतुलन बनाए रखना था।
(महाशिवरात्रि पर्व पर महाकाल मंदिर में सुबह किया गया महाकाल का श्रृंगार)
…और अंततः कैलाश के योगी ने गृहस्थ बनने का निर्णय लिया
शिव-पार्वती विवाह से पूर्व देवता व्याकुल थे। क्योंकि तीनों लोक में असुर तारकासुर का आतंक बढ़ रहा था। उसे वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल शिव के पुत्र द्वारा ही संभव है, पर शिव तो वैरागी थे।
सती के देहत्याग के बाद वे संसार से विरक्त हो चुके थे। उधर, पर्वतराज हिमालय के घर जन्मीं पार्वती जो पूर्वजन्म की सती ही थीं, एक ही संकल्प लेकर बड़ी हुईं, मैं शिव को पुनः प्राप्त करूंगी।
उन्होंने कठोर तप किया। वर्षों तक अन्न-जल त्यागकर, धूप-छांव सहकर। शिव ने उनकी परीक्षा ली। ब्राह्मण का वेश धरकर स्वयं की निंदा की, पर पार्वती अडिग रहीं। वह प्रेम जो स्वार्थ से नहीं, समर्पण से जन्मता है, वही तप की अग्नि में तपकर सत्य हुआ। और अंततः कैलाश के योगी ने गृहस्थ बनने का निर्णय लिया।
(महाशिवरात्रि पर शहडोल के विराट मंदिर में लोगों की उमड़ी भीड़)
शिव के विवाह के प्रमुख कारण
पुराणों अनुसार असुर तारकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसे केवल शिव का पुत्र ही मार सकता है। लेकिन सती के देह त्याग के बाद शिव वैराग्य में चले गए थे। देवताओं के कष्ट दूर करने और तारकासुर के अंत के लिए शिव का विवाह और पुत्र का जन्म होना अनिवार्य था।
शिव और शक्ति का मिलन
आध्यात्मिक दृष्टि से शिव ‘चेतना’ (Consciousness) हैं और पार्वती ‘शक्ति’ (Energy)। शिव के बिना शक्ति आधारहीन है और शक्ति के बिना शिव निश्चल। ब्रह्मांड के संचालन और सृजन के लिए इन दोनों का एक होना आवश्यक था।
ब्रह्मांडीय संतुलन (Cosmic Balance)
शिव को घोर वैरागी और तपस्वी माना जाता है। लेकिन उनके विवाह ने यह संदेश दिया कि संसार में वैराग्य और गृहस्थ जीवन के बीच संतुलन होना चाहिए। उन्होंने पार्वती के कठोर तप से प्रसन्न होकर और उनके समर्पण को देखकर उन्हें अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।
(रायसेन अजेय दुर्ग पर स्थित प्रसिद्ध और प्राचीन सोमेश्वर धाम)
सती और पार्वती का अटूट प्रेम
शिव महापुराण और अन्य धर्मग्रंथों में देवी पार्वती को माता सती का ही पुनर्जन्म माना जाता है। उन्होंने शिव को पुनः प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की थी, जिससे प्रभावित होकर महादेव ने अपना वैराग्य त्याग कर विवाह की सहमति दी।
शिव-पार्वती विवाह की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सती के देह त्याग के बाद शिव गहरे वैराग्य में चले गए थे। सती ने ही पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने वर्षों तक अन्न-जल त्याग कर कठोर तपस्या की। शिव ने ब्राह्मण का रूप धारण कर देवी पार्वती की परीक्षा ली और अपनी ही बुराई की, लेकिन पार्वती का विश्वास अडिग रहा।
शिव की विचित्र बारात
शिव जब बारात लेकर पहुंचे, तो उनके साथ भूत-प्रेत, डाकिनी और अघोरी थे। देवी पार्वती की माता मैना देवी यह देखकर डर गईं, लेकिन बाद में शिव के दिव्य रूप के दर्शन कर विवाह के लिए सहमत हुईं।
शिव-पार्वती का शुभ विवाह
अंततः ब्रह्मा जी की उपस्थिति में यह दिव्य विवाह संपन्न हुआ, जो आज भी त्रियुगीनारायण मंदिर (उत्तराखंड) से जुड़ा माना जाता है।
महाशिवरात्रि का महत्व
फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महादेव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ था। शिवपुराण के अनुसार, इसी रात भगवान शिव अनादि-अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे, जिसका न कोई आदि था न अंत।यह पर्व अज्ञान के अंधकार पर ज्ञान की विजय और वैराग्य में भी प्रेम व गृहस्थ धर्म के संतुलन का प्रतीक है।
विवाह जिम्मेदारी नहीं, करुणा
शिव का विवाह कोई व्यक्तिगत सुख का प्रसंग नहीं था। यह करुणा का निर्णय था। विवाह का अर्थ था पहाड़ से नीचे उतरना। समाधि से समाज में आना। निरपेक्षता से संबंधों में प्रवेश करना। यह संदेश था, भले ही परम साधु को कुछ नहीं चाहिए, पर उसके आसपास लोग भूखे हैं, भूख केवल पेट की नहीं, सुरक्षा और विश्वास की भी।
दो पुत्र, दो मानवीय आवश्यकताएं
शिव-पार्वती के दो पुत्र हुए। गणेश और कार्तिकेय। दोनों अलग, पर दोनों आवश्यक। गणेश भूख का प्रबंधन। गोल पेट, मोदक प्रिय, समृद्धि के प्रतीक। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन में अन्न, स्थिरता और भरपूरता का महत्व। उनकी माता यहां दुर्गा नहीं, अन्नपूर्णा बन जाती हैं जो रसोई की देवी हैं।
गणेश हमारी भूख को संभालते हैं। वहीं, कार्तिकेय जिनके हाथ में भाला है और वो देवसेना के सेनापति हैं। वे रक्षा के प्रतीक हैं। वे हमारे डर को संभालते हैं। मनुष्य के जीवन में दोनों ही पहलू भूख और भय जुड़े हैं और शिव के दोनों पुत्र इन्हीं का संतुलन हैं।
शिव और शक्ति, चेतना और ऊर्जा
आध्यात्मिक दृष्टि से शिव चेतना हैं और पार्वती शक्ति। चेतना बिना ऊर्जा निष्क्रिय है। ऊर्जा बिना चेतना दिशाहीन। उनका मिलन ब्रह्मांड का संतुलन है। स्वर्ग में इंद्र हैं। ऐश्वर्य में मग्न पर लोग संकट में उनके पास नहीं जाते। वे विष्णु या शिव को पुकारते हैं। क्योंकि शिव ने भूख देखी। दूसरों की आवश्यकता को महसूस किया, इंद्र ने नहीं। इसीलिए इंद्र की पूजा सीमित है और शिव जन-जन के हैं।
रामायण और महाभारत के काल में शिव केवल योगी नहीं, पति और पिता के रूप में प्रकट होते हैं। यह हिंदू चिंतन का सामाजिक रूपांतरण था। मठ से घर तक। एकांत से संबंध तक। विवाह यहां बंधन नहीं, सेतु है। गृहस्थ जीवन यहां बाधा नहीं, साधना है।
महाशिवरात्रिः प्रेम और संतुलन की रात्रि
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात शिव और पार्वती का मिलन या अनंत ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य। यह रात हमें याद दिलाती है कि वैराग्य और प्रेम विरोधी नहीं। ज्ञान और करुणा अलग नहीं, बल्कि पूर्णता और जिम्मेदारी साथ चल सकते हैं। शिव को कुछ नहीं चाहिए था। फिर भी उन्होंने विवाह किया। क्योंकि करुणा, वैराग्य से ऊंची है।
क्योंकि पूर्णता का अर्थ है दूसरों की अपूर्णता को देखना और उसे गले लगाना। शिव हमें सिखाते हैं त्याग महान है पर सहभागिता उससे भी महान और शायद इसीलिए कैलाश का वह योगी आज भी हर घर में विराजमान है।
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