हैदराबाद के पत्थरगट्टी स्थित ‘रेती वाली दरगाह’ देश की सबसे अनोखी सूफी दरगाहों में से एक है। यहां चादर चढ़ाने के बजाय कच्ची रेत पर हथेलियों के निशान बन…और पढ़ें
By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Thu, 20 Aug 2026 04:21:54 PM (IST)Updated Date: Thu, 20 Aug 2026 04:21:54 PM (IST)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर देश और दुनिया की सूफी दरगाहों में संगमरमर या पक्के पत्थरों से बनी भव्य मजारें और उन पर सजी रेशमी चादरें देखने को मिलती हैं। हालांकि, तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के ऐतिहासिक पुराने शहर (पत्थरगट्टी इलाके) में स्थित एक दरगाह अपनी अद्भुत सादगी के लिए पूरे देश में अलग पहचान रखती है। हजरत सैयद सादुल्लाह शाह नक्शबंदी (रह.) की इस दरगाह को स्थानीय लोग ‘रेती वाली दरगाह’ के नाम से पुकारते हैं। यहां की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मजारें पक्की नहीं बनी हैं, बल्कि आज भी बारीक और कच्ची रेत के रूप में सुरक्षित हैं।
चादर चढ़ाने पर मनाही, इत्र-फूल से होता है इस्तकबाल
दरगाह की सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां पारंपरिक सूती या रेशमी चादर चढ़ाने पर पूरी तरह रोक है। दरगाह पर आने वाले श्रद्धालु (अकीदतमंद) मजार पर चादर के बजाय सिर्फ सुगंधित इत्र और ताजे फूल पेश करते हैं। यहां आने वाले लोग पक्की मजारों को छूने के बजाय कच्ची रेत पर अपनी हथेलियों के निशान बनाकर दुआ मांगते हैं। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह अनूठी परंपरा लोगों को गहरा आध्यात्मिक सुकून देती है।
हजरत सैयद सादुल्लाह शाह (रह.) का रूहानी सफर
इतिहास के अनुसार, महान सूफी संत हजरत सैयद सादुल्लाह शाह (रह.) का जन्म 1199 हिजरी में हुआ था। बचपन से ही धर्म और मानवता की सेवा में लीन रहने वाले हजरत सादुल्लाह शाह आध्यात्मिक खोज में दिल्ली पहुंचे। वहां उन्होंने नक्शबंदिया सिलसिले के प्रसिद्ध संत हजरत शाह गुलाम अली देहलवी (रह.) से रूहानी मार्गदर्शन प्राप्त किया।
पवित्र हज यात्रा के बाद वे दक्कन (हैदराबाद) पहुंचे और नक्शबंदिया सिलसिले का प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र स्थापित किया। उन्होंने लगातार 25 वर्षों तक समाज सुधार और आपसी भाईचारे का संदेश फैलाया। लगभग 70 वर्ष की आयु में (28 जमादि-उल-अव्वल 1270 हिजरी) उनका विसाल (देहांत) हुआ।







