धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखण्ड की हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित केदारनाथ धाम (Kedarnath Jyotirlinga Dham) भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पांचवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह पवित्र धाम करोड़ों शिव भक्तों की आस्था का केंद्र है और मान्यता है कि जीवन में एक बार यहां दर्शन और पूजा करने से व्यक्ति के कष्ट, दोष और पापों का निवारण होता है। केदारनाथ धाम का संबंध पौराणिक कथाओं में पांडवों, नर-नारायण और आदि शंकराचार्य से जोड़ा जाता है।
बैल की पीठ जैसा क्यों है केदारनाथ ज्योतिर्लिंग
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव अपने परिजनों की हत्या के पाप से मुक्ति चाहते थे। इसके लिए उन्होंने भगवान शिव की आराधना का संकल्प लिया। कहा जाता है कि पांडव काशी से लेकर हिमालय तक भगवान शिव की खोज में पहुंचे, लेकिन महादेव उनसे मिलने के इच्छुक नहीं थे और हर बार स्थान बदल लेते थे।
मान्यता है कि जब हिमालय में पांडवों ने भगवान शिव को पहचान लिया तो उन्होंने बैल का रूप धारण कर वहां से जाने का प्रयास किया। उसी दौरान भीम ने बैल को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ केवल बैल का कूबड़ ही आया। कहा जाता है कि पांडवों की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पापों से मुक्त किया और उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर विराजमान हो गए। यही स्वरूप आज केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजित है, जिसका आकार बैल की पीठ जैसा माना जाता है।
नर-नारायण की तपस्या से जुड़ी मान्यता
केदारनाथ धाम से जुड़ी एक अन्य धार्मिक मान्यता नर और नारायण की तपस्या से संबंधित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में दोनों शिव भक्त हिमालय क्षेत्र में प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा किया करते थे। उनकी कठोर साधना और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा।
नर और नारायण ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे उसी स्थान पर सदैव निवास करें ताकि भक्तों को उनका आशीर्वाद मिलता रहे। मान्यता है कि उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान शिव वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए और तभी से केदारेश्वर के नाम से पूजे जाते हैं।
पांडवों से लेकर आदि शंकराचार्य तक जुड़ा इतिहास
धार्मिक मान्यता के अनुसार महाभारत काल में केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 400 वर्षों तक हिमालय की बर्फ के नीचे दबा रहा। बाद के समय में आदि शंकराचार्य ने इस पवित्र धाम का जीर्णोद्धार कराया, जिसके बाद यह पुनः श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना।
केदारनाथ धाम से जुड़े रोचक धार्मिक तथ्य
केदारनाथ धाम के कपाट हर वर्ष केवल छह महीने के लिए श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाते हैं, जबकि शीतकाल के दौरान छह महीने तक बंद रहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर जब भगवान केदारनाथ की चल प्रतिमा उखीमठ ले जाई जाती है, तब मंदिर में एक दीपक जलाया जाता है। मान्यता है कि यह दीपक पूरे छह महीने तक लगातार जलता रहता है।
इसके अलावा वर्ष 2013 में आई भीषण जलप्रलय के दौरान मंदिर के पीछे स्थित एक विशाल शिला ने मुख्य मंदिर को सुरक्षित रखा था। इस पवित्र शिला को आज ‘भीम शिला’ के नाम से पूजा जाता है और श्रद्धालु इसे भगवान शिव की कृपा का प्रतीक मानते हैं।
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़े सवालों के जबाव
Q1. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग किस राज्य में स्थित है?
उत्तर: केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है।
Q2. केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने कराया था?
उत्तर: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केदारनाथ मंदिर का निर्माण महाभारत काल में पांडवों ने कराया था। बाद में इसका जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य ने कराया।
Q3. केदारनाथ का शिवलिंग बैल की पीठ जैसा क्यों है?
उत्तर: मान्यता है कि भगवान शिव ने पांडवों से बचने के लिए बैल का रूप धारण किया था। भीम के पकड़ने पर बैल का कूबड़ प्रकट हुआ, जो आज केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजित है।
Q4. केदारनाथ धाम के कपाट कितने समय तक खुले रहते हैं?
उत्तर: केदारनाथ धाम के कपाट हर वर्ष लगभग छह महीने खुले रहते हैं और शीतकाल में छह महीने बंद रहते हैं।
Q5. भीम शिला का क्या महत्व है?
उत्तर: मान्यता है कि 2013 की जलप्रलय के दौरान मंदिर के पीछे स्थित भीम शिला ने केदारनाथ मंदिर की रक्षा की थी। इसलिए श्रद्धालु इसे विशेष श्रद्धा से पूजते हैं।







