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MP के साढ़े सात गांवों में माता का मायका तो कहीं ससुराल, घर लाने के लिए होती है एडवांस बुकिंग, जानें क्या है ये परंपरा

MP के साढ़े सात गांवों में माता का मायका तो कहीं ससुराल, घर लाने के लिए होती है एडवांस बुकिंग, जानें क्या है ये परंपरा

खरगोन लोकपर्व गणगौर को लेकर निमाड़ अंचल में आस्था और लोक परंपराओं के कई अनूठे रंग देखने को मिलते हैं। इन्हीं में से एक अनूठा रंग है खरगोन जिले के बेड़ …और पढ़ें

Publish Date: Sat, 21 Mar 2026 05:05:02 PM (IST)Updated Date: Sat, 21 Mar 2026 05:05:02 PM (IST)

खरगोन के बेड़िया में माता का मायका-ससुराल।

HighLights

  1. खरगोन के बेड़िया में माता का मायका-ससुराल
  2. एक दिन के अंतराल पर खुलती है देवी की बाड़ी
  3. घर लाने के लिए 2053 तक की एडवांस बुकिंग

नईदुनिया प्रतिनिधि, खरगोन। खरगोन लोकपर्व गणगौर को लेकर निमाड़ अंचल में आस्था और लोक परंपराओं के कई अनूठे रंग देखने को मिलते हैं। इन्हीं में से एक अनूठा रंग है खरगोन जिले के बेड़िया क्षेत्र में अनोखी परंपरा का। यहां माता की बाड़ी साढ़े सात गांवों के मायके और शेष गांवों के ससुराल के बीच बंटी हुई है और विशेष बात यह है कि दोनों स्थानों पर बाड़ी एक दिन के अंतराल से खोली जाती है। मायके के गांवों में माता की बाड़ी एक दिन पहले खोली जाती है, जो कि इस बार शुक्रवार को खोली गई। वहीं शेष गांवों में माता की बाड़ी शनिवार को खोली जाएगी।

देवी माता का पारिवारिक रिश्ता

क्षेत्रीय लोक मान्यताओं के अनुसार, देवी माता का इस अंचल से गहरा पारिवारिक रिश्ता है। माना जाता है कि बेड़िया और उसके आसपास के साढ़े सात गांव माता का मायका हैं, जबकि ग्राम अंजरूद सहित साढ़े सात गांव उनका ससुराल हैं। परंपरा के अनुसार माता एक दिन अपने मायके के भक्तों को दर्शन देती हैं और अगले दिन अपने ससुराल के गांवों में समय व्यतीत करती हैं। श्री रेवा गुर्जर समाज के निर्धर शिक्षा कोष अध्यक्ष रामू सेठ ने बताया कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी ग्रामीण इसका पूरी श्रद्धा से पालन करते हैं।

साढ़े सात गांवों में मायके की परंपरा और 900 रथों का उल्लास

इसी के तहत मायके पक्ष के गांवों में शुक्रवार को माता की बाड़ी खोली गई और पूरी श्रद्धा के साथ माता की पूजा-अर्चना की गई। माता के मायके में शामिल गांव बेड़िया निवासी गौरव मंडलोई, अनिल बिरला व मुकेश मुकाती ने बताया कि लंबे समय से चली आ रही परंपरा में क्षेत्र के रावेरखेड़ी, डाल्याखेड़ी, कानापुर, भोगांव-निपानी, उमरिया, मांधाता व देलगांव को गणगौर माता का मायका पक्ष माना जाता है। पूर्व में एक गांव को आधा मायके पक्ष में और आधा ससुराल पक्ष में माना जाता था इसलिए साढ़े सात गांव में माता का मायका कहा जाता है। इस बार इन गांवों में 900 से अधिक माता के रथ विराजित किए जा रहे हैं। वहीं गणगौर पर्व के लिए बेटी, बुआ आदि को बुलाने की परंपरा भी है। समाज के हर घर में जोड़े जिमाए जाते हैं। शुक्रवार को समाजजनों ने कहीं 21 तो कहीं 51 जोड़ों को भोजन करवाया।

महामारी निवारण के लिए 27 किमी की पैदल रथ यात्रा

एक अन्य मान्यता में मोठी माता का मंदिर होने से बेड़िया को माता का मायका और सनावद क्षेत्र के ग्राम अंजरूद को माता का ससुराल माना जाता है। यहां वर्षों से परंपरा है कि माता का एक रथ बेड़िया से पैदल करीब 27 किमी दूर स्थित ग्राम अंजरूद ले जाया जाता है। कहा जाता है कि महामारी निवारण की कामना कर यह रथ रवाना किया जाता है ताकि क्षेत्रवासी स्वस्थ रहें और फसलों पर भी कोई आपदा ना आए। गांव के कोटवार, चौकीदार, पुजारी आदि मिलकर हर साल माता का रथ रवाना करते हैं।

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2053 तक की एडवांस बुकिंग

जिला मुख्यालय के समीप ग्राम घोट्या में भी गणगौर पर्व को लेकर अनोखी परंपराएं हैं। यहां पाटीदार समाज द्वारा गणगौर उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। गांव के पुरुषोत्तम पाटीदार व नवनीत पाटीदार ने बताया कि गणगौर क्षेत्र का सबसे प्रमुख लोकपर्व है। इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि माता को घर लाने के लिए कतार इतनी लंबी है कि साल 2019 में ही साल 2053 तक की बुकिंग हो चुकी है। आगे की बुकिंग रोकना पड़ी है। इसमें माता को घर लाने, फूलों से रास्ता सजाने, जवारों के लिए गेहूं दान देने आदि की एडवांस बुकिंग होती है।

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