धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के सभी विघ्न और बाधाएं दूर होती हैं।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व
भगवान गणेश के 32 स्वरूपों में द्विजप्रिय गणेश छठा स्वरूप माने जाते हैं। ‘द्विज’ का अर्थ है दो बार जन्म लेने वाला और शास्त्रों का ज्ञाता। इस स्वरूप में भगवान गणेश के चार मस्तक और चार भुजाएं मानी जाती हैं। मान्यता है कि द्विजप्रिय गणेश की पूजा से भक्त को उत्तम स्वास्थ्य, लंबी आयु और तीव्र बुद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि
प्रातः स्नान कर लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
चौकी या वेदी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
गंगाजल से प्रतिमा का शुद्धिकरण करें।
गणेश जी को सिंदूर का तिलक लगाएं।
अक्षत, फूल, दूर्वा, मोदक, धूप और दीप अर्पित करें।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की कथा का पाठ करें।
अंत में गणेश जी की आरती करें।
रात में चंद्र दर्शन के बाद दूध, जल और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
पूजा के दौरान हुई भूल-चूक के लिए भगवान से क्षमा याचना करें।
भगवान गणेश के प्रिय फूल
भगवान गणेश को लाल रंग के फूल अत्यंत प्रिय हैं। विशेष रूप से गुड़हल का फूल और दूर्वा अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है।
बप्पा का प्रिय भोग
गणेश जी को मोदक सबसे प्रिय हैं। इसके अलावा बेसन या मोतीचूर के लड्डू भी अर्पित किए जा सकते हैं। मान्यता है कि इस दिन चना दाल और गुड़ का भोग लगाने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
ॐ द्विजप्रियाय नमः
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
इन बातों का रखें विशेष ध्यान
गणेश जी की पूजा में तुलसी के पत्तों का प्रयोग न करें, क्योंकि यह वर्जित माना गया है। साथ ही इस दिन किसी का अपमान न करें और मन में सात्विक भाव बनाए रखें।







