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Shradha Paksha 2025: 7 सितंबर से शुरू हो रहे श्राद्ध, इस बार 16 की बजाय 15 दिन का रहेगा श्राद्ध पक्ष

Shradha Paksha 2025: 7 सितंबर से शुरू हो रहे श्राद्ध, इस बार 16 की बजाय 15 दिन का रहेगा श्राद्ध पक्ष

Shradha Paksha 2025: श्राद्ध पक्ष पूर्णिमा सात सितंबर से शुरू होंगे। इस वर्ष पंचम षष्ठी एक दिन शुक्रवार को होने के कारण सोलह श्राद्ध में से एक दिन घटकर 15 दिन के होंगे। सनातन धर्म पितरों की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष का बड़ा महत्व है।

Publish Date: Thu, 04 Sep 2025 09:53:00 PM (IST)

Updated Date: Thu, 04 Sep 2025 09:53:00 PM (IST)

सात सितंबर से शुरू होंगे श्राद्ध पक्ष

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। श्राद्ध पक्ष पूर्णिमा सात सितंबर से शुरू होंगे। इस वर्ष पंचम षष्ठी एक दिन शुक्रवार को होने के कारण सोलह श्राद्ध में से एक दिन घटकर 15 दिन के होंगे। सनातन धर्म पितरों की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष का बड़ा महत्व है। ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में पितर लोक से पितृ धरती पर आते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। ज्योतिषाचार्य पं रवि शर्मा ने बताया कि वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए।

हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।

क्या दिया जाता है श्राद्ध में

श्राद्ध में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। साथ ही पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है।

किस तारीख में करना चाहिए श्राद्ध

सरल शब्दों में समझा जाए तो श्राद्ध दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना है। अगर किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है। इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है। इस विषय में कुछ विशेष मान्यता भी है। पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है।

जिन परिजनों की अकाल मृत्यु हुई जो यानि किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है। जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है।

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