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Rajasthan:  जूली ने सूचना का अधिकार अधिनियम को लेकर पीएम मोदी को लिखा पत्र, इस धारा को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की कर डाली मांग  | Parmarth TV

Rajasthan:  जूली ने सूचना का अधिकार अधिनियम को लेकर पीएम मोदी को लिखा पत्र, इस धारा को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की कर डाली मांग  | Parmarth TV

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जयपुर। राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सूचना का अधिकार अधिनियम को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पत्र लिखा है। उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम को कमजोर किए जाने का आरोप लगा सोशल मीडिया के माध्यम से अननी प्रतिक्रिया दी है।

टीकाराम जूली ने इस संबंध में आज एक्स के माध्यम से कहा कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपीए) के माध्यम से सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट) को कमजोर किया जा रहा है, जो लोकतंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए एक बड़ा खतरा है। इस विषय को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री को पत्र लिखा है।

जूली ने कहा कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम 2005 के पीछे देश की पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की दूरदृष्टि, राजनीतिक इच्छाशक्ति और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता थी, जिन्होंने इस ऐतिहासिक कानून को लागू किया।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस आरटीआई कानून ने देश में सुशासन, जवाबदेही और जनभागीदारी की भावना को मजबूती दी, आज उसी कानून की आत्मा को भाजपा सरकार कमजोर करने का प्रयास कर रही है। आरटीआई कोई साधारण कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है, यह नागरिकों को सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल जवाब पूछने का अधिकार देता है।

डीपीडीपीए की धारा 44(3) सूचना के अधिकार की मूल भावना को आघात पहुँचाती है और नागरिकों की महत्वपूर्ण जानकारी तक पहुंच को बाधित करती है। यह संशोधन न केवल पारदर्शिता को सीमित करेगा, बल्कि भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर भी देगा। यह बेहद चिंताजनक है कि इस मुद्दे को लेकर देश के विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े लगभग 150 माननीय सांसदों ने भारत सरकार को पत्र लिखकर गहरी चिंता जाहिर की है।

सूचना का अधिकार कमजोर हुआ तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा
जूली ने कहा कि मैं केंद्र सरकार से आग्रह करता हूँ कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए डीपीडीपीए अधिनियम की धारा 44(3) को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए। इसके अतिरिक्त, अधिनियम के कुछ प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भी विरुद्ध प्रतीत होते हैं, जिनकी पुन: समीक्षा आवश्यक है। सूचना का अधिकार कमजोर हुआ तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा और यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।

PC:patrika
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