राजेश वर्मा, उज्जैन। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की जिस मित्रता की कहानी द्वापर युग से आज तक सुनाई जाती है, उसकी गवाही उज्जैन के समीप ग्राम नारायणा में आज भी हरे-भरे वृक्ष दे रहे हैं।
मान्यता है कि करीब पांच हजार साल पहले श्रीकृष्ण और सुदामा जंगल से जिन लकड़ियों को बीनकर लाए थे, वे कालांतर में वृक्षों में बदल गईं।
आज भी नारायणा में मौजूद इन वृक्षों को श्रद्धालु कृष्ण-सुदामा की अटूट मित्रता की जीवंत निशानी मानते हैं। पुजारी प्रेम नारायण शर्मा के अनुसार समय और युग बदलने के साथ कृष्ण-सुदामा की मित्रता की जड़ें और भी गहरी होती जा रही हैं।
मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलदाऊ के साथ उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने आए थे। गुरु आश्रम में उन्होंने वेद, शास्त्र, पुराण तथा विभिन्न कलाओं और विद्याओं का अध्ययन किया।
एक दिन गुरु माता ने भगवान श्रीकृष्ण से सखा सुदामा के साथ जंगल से रसोई के लिए सूखी लकड़ियां लाने को कहा। गुरु माता की आज्ञा पाकर दोनों मित्र उज्जैन से पैदल जंगल की ओर निकल पड़े।
चलते-चलते वे वर्तमान ग्राम नारायणा पहुंचे और यहां स्थित स्वर्णागिरी पर्वत पर लकड़ियां एकत्र करने लगे। दोनों ने लकड़ियों के गट्ठर तैयार किए ही थे कि अचानक मौसम बदल गया। देखते ही देखते आकाश में काले बादल घिर आए और जोरदार वर्षा शुरू हो गई।
बरसात से बचने के लिए दोनों मित्र लकड़ियों के गट्ठर सिर पर रखकर पर्वत से नीचे आए। एक स्थान पर लकड़ियां रखकर दोनों एक घने पेड़ पर चढ़कर बैठ गए। रातभर घनघोर वर्षा होती रही। भोर होने पर दोनों मित्र आश्रम के लिए रवाना हो गए, लेकिन लकड़ियां वहीं रह गईं।
मान्यता है कि यही लकड़ियां कालांतर में हरे-भरे वृक्षों में बदल गईं। आज भी नारायणा में मौजूद इन वृक्षों को श्रद्धालु श्रीकृष्ण-सुदामा की मैत्री की जीवंत निशानी मानते हैं। यही कारण है कि नारायणा कृष्ण भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है और देशभर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
राधा नहीं, सुदामा के साथ विराजते हैं भगवान
नारायणा धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहां का मंदिर है। आमतौर पर भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों में उनके साथ राधाजी के दर्शन होते हैं, लेकिन नारायणा में भगवान श्रीकृष्ण अपने बाल-सखा सुदामा के साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि देश में यह अपने तरह का अनूठा मंदिर है, जहां कृष्ण-सुदामा की मित्रता को ही आराध्य स्वरूप में प्रतिष्ठित किया गया है। मंदिर में विराजमान कृष्ण-सुदामा की जोड़ी मित्रता, स्नेह और समानता का संदेश देती है। वहीं मंदिर परिसर में मौजूद हरे-भरे वृक्ष इस पौराणिक कथा को और खास बना देते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान के दर्शन के साथ उन वृक्षों को भी नमन करते हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण-सुदामा की मैत्री की निशानी माना जाता है।
घंटियों की तरह बजते हैं स्वर्णागिरी के पत्थर
नारायणा का स्वर्णागिरी पर्वत भी भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की कथा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि दोनों मित्र इसी पर्वत पर रसोई के लिए लकड़ियां बीनने पहुंचे थे। भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़ने से यह पर्वत स्वर्णिम हो गया, इसलिए इसका नाम स्वर्णागिरी पड़ा। स्वर्णागिरी की एक और विशेषता यहां के पत्थरों को लेकर है। मान्यता है कि पर्वत के पत्थर जब एक-दूसरे से टकराते हैं तो धातु की घंटी जैसी आवाज करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह पर्वत की रहस्यमयी विशेषताओं में शामिल है। प्रत्येक माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी पर स्वर्णागिरी पर्वत की परिक्रमा का विधान है। श्रद्धालु इसे गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा के समान पुण्यदायी मानते हैं।







