धर्म डेस्क। देशभर में मंदिर देवी-देवता के नाम पर जाने जाते हैं। किंतु ग्वालियर शहर में एक मात्र ऐसा मंदिर है, जो कि पुजारी (भक्त) के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर है कैंसर पहाड़ी पर स्थित मांढरे की माता का मंदिर।
मंदिर का इतिहास -यहां अष्टभुजा महिषासुर मर्दनी विराजित हैं। यह मंदिर 140 वर्ष से अधिक प्राचीन बताया जाता है। इस मंदिर की ख्याति सिंधिया राजघराने की कुल देवी के रूप में है। देवी को सिंधिया सेना में कर्नल आनंद राव मांढरे सतारा से लेकर आए थे।
मांढरे की माता के सतारा से यहां आकर विराजित होने की किवदंती राजपरिवार से जुड़ी हुई है। मंदिर की स्थापना तत्कालीन शासक जयाजी राव सिंधिया ने कराई थी।
सिंधिया राजपरिवार ने देवी में अगाध श्रद्धा होने के कारण आनंद राव मांढरे को सेना के दायित्व से मुक्त कर मां की सेवा का दायित्व सौंपा था। आज मांढरे परिवार की पांचवीं पीढ़ी यहां सेवा कर रही है।
मंदिर की क्या है विशेषता
मां के परम भक्त आनंदराव को सपने में माता ने दर्शन दिए और मंदिर की स्थापना करने की बात कही। यह बात कर्नल आनंदराव ने महाराज जयाजीराव सिंधिया को बताई और उन्होंने तुरंत ही मंदिर की स्थापना करवा दी। सिंधिया राजवंश की कुलदेवी मांढरे की माता, मां काली की इस प्रतिमा के दर्शन जयाजी राव सिंधिया अपने जयविलास पैलेस से दूरबीन से करते थे। महल और मंदिर का दरवाजा आमने-सामने होने के कारण दर्शन आसानी से हो जाते थे। इसके अलावा राजपरिवार का मुखिया शरदीय नवरात्र की नवमी को यहां पूजा-अर्चना करने के लिए आता है।
अर्जी लगाते ही होती है मनोकामना पूर्ण
माता के मंदिर में आने वाले भक्तों द्वारा अर्जी लगाने पर उनकी हर मनोकामना पूरी हो जाती है। अर्जी के लिए श्रद्धालु नारियल, चुनरी, फूल, हल्दी, रोरी को एकत्रित कर मंदिर में बांध दिया जाता है, वहीं मनोकामना पूरी होने पर इसे खोलने भी आना पड़ता है। माढरे की माता के प्रति लोगों को अगाध श्रद्धा हैं।नवरात्र में यहां मेला जैसा माहौल रहता है।यह राजपरिवार की कुलदेवी हैं।यहां हर भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है।हम लोग बचपन से दर्शन करने के लिए जाते हैं।







