डिजटिल डेस्क। न्याय का नाम सुनते ही हमारे मन में अदालत की छवि उभर आती है, जहां आरोपितों की पेशी होती है, सुनवाई होती है और दोष सिद्ध होने पर सजा मिलती है, अन्यथा रिहाई। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि एक अदालत ऐसी भी होती है, जहां देवी-देवताओं की पेशी होती है? हां, आप यह सुनकर शायद चौंक जाएंगे, लेकिन यह सच है।
देवी-देवताओं को न्याय के लिए बुलाया जाता है
यह अद्भुत अदालत बस्तर के केशकाल में आयोजित होती है। यहां देवी-देवताओं को न्याय के लिए बुलाया जाता है और जज की भूमिका में विराजती हैं भंगाराम देवी, जो बारह मोड़ वाली सर्पीली केशकाल घाटी के ऊपर स्थित एक मंदिर में पूजा करती हैं।
श्रद्धालु अपनी शिकायतें लेकर यहां पहुंचते हैं, और देवी-देवताओं को सजा देने से लेकर उनके मान्यता के निलंबन तक का फैसला सुनाया जाता है। कभी-कभी तो सजा-ए-मौत भी सुनाई जाती है।
भादो जातरा का आयोजन
यह अद्भुत अदालत प्रतिवर्ष भादो मास के कृष्ण पक्ष में शनिवार के दिन आयोजित होती है। इस दिन को ‘भादो जातरा’ कहा जाता है, जो आदिवासी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है। जातरा के आयोजन से पहले, प्रत्येक वर्ष के पहले पांच या सात शनिवार को विशेष पूजा और सेवा की जाती है और अंतिम शनिवार को मुख्य उत्सव होता है।
इस दौरान, आदिवासी समुदाय के 55 राजस्व ग्रामों से देवी-देवताओं के प्रतीक जैसे लाठ, आंगा, छत्र, डोली आदि भंगाराम देवी मंदिर में लाए जाते हैं।
देवी-देवताओं को मिलता है अपनी बात रखने का अवसर
अदालत में केवल देवी-देवताओं की पेशी ही नहीं होती, बल्कि उन्हें अपनी बात रखने का भी पूरा मौका मिलता है। जब किसी गांव में विपत्ति या आपदा आती है, या फिर पूजा-अर्चना के बाद भी जीवन में परेशानियां बनी रहती हैं, तो ग्रामीण देवी-देवताओं को दोषी ठहराकर भंगाराम देवी की अदालत में शिकायत करते हैं।
देवी-देवताओं के प्रतिनिधि के रूप में पुजारी और मुखिया वहां उपस्थित रहते हैं और उनके द्वारा देवी-देवताओं का पक्ष रखा जाता है।
थाने में होती है देवी-देवताओं की हाजिरी
भंगाराम देवी के पास जाने से पहले, भंगाराम सेवा समिति के सदस्य देवी-देवताओं के प्रतीकों को थाने ले जाते हैं। वहां उनका पूजन होता है, और फिर पुलिस सुरक्षा में उन्हें भंगाराम देवी मंदिर तक लाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया देवी-देवताओं की महिमा और सम्मान को दिखाती है, और गांव के लोगों के विश्वास को भी दृढ़ करती है।
बीमारी के समय ‘डॉक्टर खान’ की पूजा
सिर्फ देवी-देवताओं की ही नहीं, बल्कि इस क्षेत्र के एक विशिष्ट व्यक्ति की भी पूजा की जाती है। वर्षों पहले यहां एक डॉक्टर खान हुआ करते थे, जो नि:स्वार्थ भाव से बीमारों का इलाज करते थे। उनके निधन के बाद ग्रामीणों ने उन्हें एक देवता के रूप में मान्यता दी।
आज भी, जब क्षेत्र में कोई महामारी या बीमारी का प्रकोप होता है, तो सबसे पहले डॉक्टर खान की पूजा की जाती है, ताकि उनका आशीर्वाद प्राप्त हो और बीमारी का नाश हो।
विश्वासों और परंपराओं को जीवित रखते हैं
इस अद्भुत परंपरा के पीछे एक गहरी आस्था और विश्वास है, जो आदिवासी समुदाय के जीवन में न्याय और देवत्व की महिमा को दर्शाता है। यहां के लोग इस अद्भुत अदालत को एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं और हर वर्ष इसका आयोजन करके अपने विश्वासों और परंपराओं को जीवित रखते हैं।







